बाहुबलियों के ग्लैमर में उलझी उत्तर प्रदेश की राजनीति

By: jhansitimes.com
Apr 15 2018 09:00 pm
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भाजपा में अटल-आडवाणी युग का पार्टी विद ए डिफरेंस का नारा वर्तमान दौर में अप्रासंगिक हो गया है। ऐसा नही है कि उस दौर में भाजपा में एक भी दागी न हो लेकिन समग्रता में भाजपा दागियों, खासतौर से आपराधिक छवि वाले नेताओं से दूरी बनाकर चलने की कोशिश करती थी। कल्याण सिंह राजनीति के अपराधीकरण के मामले में बहुत सख्त थे। पहली बार जब वे मुख्यमंत्री बने थे तब अपनों तक के आपराधिक रिकार्ड की जानकारी होने पर वे भड़क जाते थे। इन पंक्तियों के लेखक को याद है कि उनके एक विधायक ने जो बाद में सांसद बने अपने जिले के एसएसपी की शिकायत की जिस पर कल्याण सिंह ने एसएसपी को तलब कर लिया। लेकिन एसएसपी ने पेशबंदी में कल्याण सिंह को पहले ही विधायक की क्रिमिनल हिस्ट्री भिजवा दी जिसे देखते ही कल्याण सिंह का जायका खराब हो गया। उन्होंने एसएसपी को तो छोड़ दिया लेकिन विधायक को वो डांट पिलाई कि उनके होश फाख्ता हो गये।

उन्होंने कहा कि पहले तो यह जांच होनी चाहिए कि तुम्हें इतने मुकदमें होते हुए भी भाजपा का टिकट किसने दिला दिया। अब विधायक बन गये हो तो कर्म सुधारो। थाने और एसपी के पास फटकना भी मत। एक भी नया मुकदमा तुम्हारे या तुम्हारे गैंग के खिलाफ दर्ज हो गया तो अगली बार तुम्हें विधायक का टिकट तक नही मिलने दूंगा। 1997 में कल्याण सिंह जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो स्थितियां बदल गई थीं। समर्थन लेने के लिए उन्हें नरेश अग्रवाल से निर्लज्ज समझौता करना पड़ा। कल्याण सिंह की आत्मा शायद इसके लिए गंवारा नही कर रही थी लेकिन उस समय राजनाथ सिंह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे उन्होंने पार्टी की प्रतिष्ठा का वास्ता देकर कल्याण सिंह को मजबूर किया कि वे नरेश अग्रवाल के साथ दल बदल करके उन्हें समर्थन देने आये सभी 21 विधायकों को मंत्री बनाने की शर्त मान लें। इनमें से कई दागी थे जिसे हजम करना कल्याण सिंह को बहुत भारी पड़ा होगा। इसके बाद राजनाथ सिंह के खुद मुख्यमंत्री बनने तक गोमती में काफी पानी बह गया। राजनाथ सिंह ने बाहुबलियों का समर्थन लेने में कोई परहेज नही किया। हालांकि भाजपा का यह पतन जनमानस को रास नही आ सका जिसकी वजह से राजनाथ सिंह के बाद लगभग डेढ़ दशक तक उत्तर प्रदेश में भाजपा को राजनीतिक निर्वासन की स्थितियां झेलनी पड़ीं।

उम्मीद की गई थी कि भाजपा इससे आगे चलकर सबक सीखेगी लेकिन उत्तर प्रदेश में ही नही नरेंद्र मोदी और अमित शाह युग में भाजपा सारे देश में राजनीतिक संस्था की बजाय व्यापारिक कंपनी में तब्दील हो चुकी है इसलिए प्रतिबद्धता और मर्यादा के नाम पर कोई वर्जना उसे मंजूर नही है। इसमें करेला और नीम चढ़ा की हालत तब बन गई जब योगी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया गया। जो अपने ऊपर बीतने पर संसद में रो पड़ने तक की कांतर गति को प्राप्त हो चुके हैं लेकिन बाहुबल के प्रति आकर्षित रहना उनके स्वभाव में है। आम भाजपाइयों में एक ओर संस्कार आड़े रहते हैं दूसरी ओर बाहुबल को मान्यता देने की प्रतिस्पर्धा में सपा को मात कर जाने की ललक भी उनमें है। इस द्वंद ने उनका चाल-चेहरा बिगाड़ रखा है। उन्नाव के बाहुबली विधायक की करतूत को मैनेज करने में सपा जैसी दिलरे और दक्षता का प्रदर्शन भाजपा की बूते की बात नही थी। ये मुददा ऐसे गले पड़ा है कि पार्टी के दिग्गजों तक के होश फिलहाल गुम हैं।

भाजपा के कर्णधारों को एक बार सोचना पड़ेगा कि पार्टी को जो छवि अपने पूर्वज नेताओं से विरासत में मिली है उसके रहते वे कुछ गुनाह है जिनको सफलता के नाम पर उसने यह सोचकर कर दिये कि जब उनकी प्रतिद्वंदी पार्टियां ऐसे रास्ते से ही अपनी गोटियां लाल करती रहीं हैं तो उन्हें इन तौर-तरीकों से कार्य सिद्धि क्यों नही होगी तो वे बहुत वे गंभीर खामियाजा उठा जायेगें। मोदी और शाह की जोड़ी को सर्वसत्तावाद का जस्का चढ़ा है इसलिए सकारात्मक लोकप्रियता अर्जित करने के बाद भी वे निकृष्ट हथकंडे अपनाने के प्रलोभन से अपने को मुक्त नही रख पा रहे हैं क्योंकि उन्हें हर चुनाव देखकर अपनी स्थिति को चुनौती विहीन बनाने का उन्माद सवार है। उन्हें यह सोचना चाहिए कि वे राजीव गांधी भी नही बन सकते जिन्होंने 1985 की लोक सभा की 410 सीटें जीतकर न भूतों न भविष्यत बहुमत हासिल किया था। जिससे यह धारणा बन गई थी कि अब दो-तीन दशक तक उनकी सत्ता को हिला नही पायेगा लेकिन अगले ही चुनाव में उनकी सरकार ढेर हो गई। दूसरी ओर गठबंधन सरकार चलाते हुए भी अटल जी और मनमोहन सिंह पुनरावृत्ति कर पाने में सफल रहे।

भाजपा ने राजनीतिकरण के दुष्परिणामों को बहुत झेला है। उत्तर प्रदेश में इस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दमन और उत्पीड़न के लंबे दौर का सामना किया है। इसलिए यह पार्टी राजनीति को बाहुबलियों से मुक्त कराने का दम भरती रही है लेकिन व्यवहारिक रूप से आज वह उत्तर प्रदेश तक में बहती गंगा में हाथ धोने से बाज नही आ रही। 2017 के विधानसभा चुनाव में सारे सर्वे उसके बहुमत का एलान कर रहे थे फिर उसे क्या जरूरत थी कि वह दूसरे दलों से कुलदीप सेंगर और अशोक चंदेल जैसे नगीने अपनी पार्टी के लिए आयात करके लाई। मुकदमें केशव मौर्या और रामशंकर कठेरिया पर भी है लेकिन उनके मुकदमों के पीछे निजी दबंगई के मामले नही हैं। बल्कि पार्टी की हिंदुत्ववादी विचार धारा के लिए संघर्ष के क्रम में उन्हें आरोपित होना पड़ा। ये नगीने जो हर पार्टी में नवरत्न के रूप में स्वीकार होते रहते हैं किसी विचारधारा के लिए जौहर दिखाने वालों में नही हैं। आजकल इन्हीं की श्रेणी के एक और निर्दलीय विधायक विजय मिश्रा पर भाजपा की निगाहें इनायत हो रहीं हैं। आरोप तो यह तक है कि फूलपुर लोकसभा उपचुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने अंदर खाने अतीक अहमद से भी दोस्ती कर ली थी।

क्या हर चुनाव जीतना जरूरी है। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के लिए भाजपा के केवल आठ उम्मीदवार जीत सकते थे लेकिन पर्याप्त विधायक न होते हुए भी भाजपा नवीं सीट के फेर में क्यों पड़ी जिसकी वजह से व्हिस्की में विष्णु और रम में राम बसाने वाले नरेश अग्रवाल को उसे पार्टी में शामिल करना पड़ा। अब विधान परिषद चुनाव में फिर पार्टी की हनक दांव पर है। जिन राजा भइया को कल्याण सिंह तक कुंडा का जाने क्या कह चुके थे आजकल वे योगी सरकार के मार्गदर्शक हैं। खबर है कि उनके साथ 28 राजपूत विधायक हैं जो कुलदीप सिंह के मामले मे बगावत कर सकते हैं। उनसे महत्वपूर्ण पद छीनते समय उनकी इस हैसियत की परवाह अखिलेश ने तो नही की थी जबकि उस समय भी उनके साथ राजपूतों का गुट था। योगी अपने नेता नरेंद्र मोदी से ही प्रेरणा ले सकते हैं। लालकृष्ण आडवाणी और प्रवीण तोगड़िया के पास क्या कम बड़ा गुट था। लेकिन अगर आपका नेतृत्व प्रभावशाली है तो दूसरा शक्ति केंद्र कहां टिक पायेगा। इसके अलावा अगर विधान परिषद के चुनाव में कोई गड़बड़ी हो जायेगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव तो अप्रत्यक्ष हैं। जब आपने दो लोक सभा के प्रत्यक्ष उपचुनावों में जिसमें आपकी अपनी सीट भी शामिल थी हार कर अपनी चमड़ी नही छिलने दी तो अब छोटे-मोटे घाव की फिक्र क्यों है।

अहम मुददा यह है कि भाजपा के सत्ता में अवसर मिला है तो बाहुबल राजनीति में अप्रासंगिक बनना चाहिए। इसके लिए कटिबद्ध कोशिशों की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय में जो आंकड़े दिये गये हैं उनके मुताबिक देश भर में 4896 सांसद विधायकों में 1766 पर आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। इस तरह 36 प्रतिशत माननीय आपराधिक दृष्टि से दागी हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश के सांसद और विधायकों की है जिनकी गिनती 248 है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में दिखावटी तौर पर भाजपा सबसे ज्यादा संवेदनशील पार्टी है। इस नजरिये से देखें तो 51 सांसद और विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध करने के मुकदमें हैं। जिनमें विधायकों की संख्या 48 है और सांसद 3 हैं। इनमें सबसे ज्यादा अब्बल भाजपा ही है जिसके 14 माननीय महिलाओं के खिलाफ अपराधों में संलिप्तता में दर्ज हैं। बहाना हो सकता है कि लोग खुद ही बाहुबलियों को चुनना चाहते हैं तो पार्टिया उन्हें नजरअंदाज कैसे करें। इसकी सबसे बड़ी मिसाल वे बाहुबली हैं जो निर्दलीय खड़े होकर भी चुनाव जीत ले जाते हैं। लेकिन जनता नही इसमें भी राजनैतिक पार्टियां ही दोषी हैं।

कोई पार्टी निष्पक्ष और प्रभावी शासन की गारंटी नही कर पा रही। अधिकारों की रक्षा के मामले में शासन-प्रशासन में मुंह देखा व्यवहार होता है। पुलिस, मजिस्ट्रेट, अदालतें, प्रभावशाली लोगों की मदद करती हैं। जिसकी बदौलत अन्याय करना उनके खून में शामिल हो गया है। सरकार चलाने वाले राजनीतिक दलों को कानून का शासन चलाने की चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी और त्वरित राहत व न्याय को सुनिश्चित करना होगा। अपराधियों के समर्थन का दूसरा कारण है वर्ण व्यवस्था जिस जाति के गुंडों का जहां जलवा होता है उसकी जाति के कमोवेश हर आदमी का रौब उसके इलाके में गालिब रहता है। वर्ण व्यवस्था आधिपत्यवादी सोच की व्यवस्था है यह सोच खत्म होनी चाहिए। इसके कारण अपराधी को गांव-गांव में उसका काम करने के लिए आदमी मिल जाते हैं उसका सघन नेटवर्क बन जाता है। अगर जाति आधारित खंडित समाज की जगह एकजुट नागरिक समाज यानी सिविस सोसाइटी पैर पसार सके तो राजनीति में बाहुबलियों की हैसियत खुद व खुद समाप्त हो जाये। राजनैतिक दल अगर इच्छा शक्ति दिखाये तो यह काम किया जाना दुष्कर नही है।


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