मोदी से बड़ा चेहरा योगी में तराशने में जुटा संघ.... बता रहे, प्रधान संपादक के.पी सिंह

By: jhansitimes.com
Oct 23 2017 05:06 pm
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उत्तर प्रदेश में 6 माह में ही योगी सरकार पर एण्टीइनकम्बेंसी फैक्टर की छाया मड़राने लगी है। प्रचण्ड बहुमत से प्रदेश में भाजपा की सरकार गठित होने के कारण लोगों को बहुत सार्थक कामों की उम्मीद थी, लेकिन प्राथमिकता के किसी भी काम में यह सरकार जन अपेक्षाओं की कसौटी पर अपने को खरा साबित नहीं कर पाई है। सपा व बसपा की सरकारों पर जातिवादी मानसिकता से काम करने के आरोप रहे थे और लोग उम्मीद कर रहे थे कि भाजपा इससे प्रदूषित चले आ रहे सामाजिक परिवेश के शुद्धीकरण करने वाली कार्यशैली अपनाएगी। लेकिन योगी सरकार पर कुछ ही दिनों में ठाकुरवाद का ऐसा ठप्पा लग गया। जिससे उनके प्रशंसक तक मोहभंग का शिकार होने से नहीं बच पाए हैं। मथुरा में संघ की समन्वय बैठक में प्रदेश सरकार की दिशाहीन कार्यशैली को लेकर असन्तोष के सुर फूटे तो लगा कि योगी सरकार अपनी रीतिनीति में बदलाव को मजबूर होगी। लेकिन हुआ उल्टा संघ की ओर से योगी पर दवाब बनाना तो दूर उन्हें और अधिक शक्ति सम्पन्न बनाने की कवायद शुरू कर दी गई है। तो क्या संघ सुशासन और विकास के लिए माथा पच्ची करने की बजाय हिन्दू राष्ट्र को साकार रूप प्रदान करने में ही सारी ऊर्जा लगाना अपना अपना एक मात्र अभीष्ट बनाए हुए है।


जब योगी ने उ0प्र0 के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी उसी समय मीडिया में यह कयास जाहिर किए जाने लगे थे कि उनकी शुरूआत बताती है कि आगे चलकर वे ही प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के विकल्प बनेंगे। यह माहौल लगभग एक महिने से अधिक समय तक छाया रहा। टेलीविजन चैनलों की टीआरपी में कई सप्ताह मोदी योगी से पिछड़े। जिसे लेकर उनमें योगी के प्रति ईष्र्या जनित चिढ़ की खबरें भी आती रहीं। लेकिन मधु मिलन का दौर समाप्त होते ही जब भावुकता की बजाय वास्तविकता के आधार पर योगी के मूल्यांकन का समय आया तो उनका महिमा मण्डन कुछ ही दिनों में धूमकेतु की तरह अस्त होने पर आ गया। निश्चित रूप से मोदी को इससे काफी सन्तोष मिला होगा। क्योंकि वे लोकप्रियता के आसमान पर एक मात्र चमकने वाले ध्रुव तारा बने रहना चाहते हैं। उन्हें इस में अपने साथ किसी को साझा करना गवारा नहीं है। भारतीय जनता पार्टी में भी एक बड़ा वर्ग कहने लगा था कि संतों महंतों की बजाय सरकार की बागडोर राजनाथ सिंह ही नहीं, केशव मौर्य को ही सौंप दी गई होती तो बेहतर था। क्योंकि सरकार चलाने का हुनर खांटी राजनीतिज्ञ ही जानते हैं। मथुरा की बैठक में यह आभास कराया गया कि संघ भी इन चर्चाओं को गंभीरता से संज्ञान में ले रहा है।


लेकिन इस तरह का आभास दिया जाना अंततोगत्वा चकमेबाजी साबित कर दिया गया। अब तो यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या संघ की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भृकुटि टेढ़ी हो गई है। दरअसल संघ ने 1977 में साझे की हांडी के रूप में पहली बार केन्द्र की सरकार के गठन के समय ही देश को हिन्दू राष्ट्र के रूप में ढालने का समयबद्ध कार्यक्रम तैयार कर लिया था। उस समय भोपाल में संघ की गोपनीय बैठक में तत्कालीन प्रमुख बाला साहब देवरस का भाषण यूएनआई के जाॅल खंभाटा द्वारा लीक किए जाने की बजह से ही मोरारजी सरकार का असमय पतन हो गया था और पहली गैर कांग्रेस सरकार की इस तरह की विफलता कांग्रेस के लिए राजनैतिक पुनर्जीवन प्राप्त करने हेतु संजीवनी साबित हुई थी। इसके बाद संघ को लम्बे समय तक के लिए सुसुप्तावस्था में जाना पड़ गया था। इस बीच अटल आडवाणी की जोड़ी की सरकार केन्द्र में जोड़तोड़ से बनती रही, लेकिन संघ ने उनके सामने अपने एजेण्डे के लिए दवाब नहीं बनाया। एक तो अटलजी की सरकार को अपने दम पर बहुमत नहीं था। इसलिए संघ अपनी टांग अड़ाने में स्वाभाविक रूप से कोई बुद्धिमानी नहीं समझ रहा था। दूसरे अटलजी का कद इतना बड़ा था कि उन्हें दिशा निर्देशित करने की हैसियत में भी संघ नहीं था। इसलिए उनके सुशासन के आलाप को संघ ने झेला। लेकिन मोदी के मामले में संघ उस दौर की तरह उदासीन बना नहीं रह सकता।


गुजरात की राजनीति से एकदम राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में मोदी को ले आने का पूरा श्रेय संघ को है। इसलिए संघ उन्हें अपना प्रोडक्ट मानकर अपने प्रति आज्ञाकारी रहने की अपेक्षा करता है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वैश्विक मानकों, धारणाओं के पंख जबसे लगे हैं। तबसे उनका रूपान्तरण हो चुका है। उन्हें अपने विश्वनेता के कद की बहुत चिन्ता रहती है। इसलिए समान नागरिक संहिता हो या दूसरे मामले वे कुछ ऐसा नहीं करना चाहते जिससे प्रतीत हो कि वे मुसलमानों पर कुछ थोप रहे हैं। दूसरी ओर संघ मानता है कि हर वह काम किया जाना चाहिए। जिससे गैर हिन्दू जनता यह सोचने को मजबूर रहे कि वे यहां हिन्दू समुदाय के कृपा पात्र बने रहकर ही अपनी बसर कर पाऐंगे। साथ ही हिन्दू राष्ट्र को जो कि राम राज्य के यूटोपिया में प्रतिबिंबित होता है, को लोगों की सारी समस्याओं के हल का स्वयमेव निदान की कुंजी संघ मानता है और उसे विश्वास है कि हिन्दू राष्ट्र बन जाने पर यह देश आगे बढ़ सकेगा और विश्वगुरू व दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति बन सकेगा।


लेकिन संघ का यह विश्वास यथार्थ के अनुरूप नहीं है। वास्तविकता यह है कि वर्ण व्यवस्था पर आधारित हिन्दू राष्ट्र की धारणा की वजह से ही अतीत में संसाधन संपन्न होते हुए भी सामाजिक व राजनैतिक एकता के छिन्न भिन्न होने के चलते भारत को छोट-छोटे लड़ाकोें से शिकस्त खानी पड़ी और लम्बे समय तक गुलामी का दंश झेलना पड़ा। मोदी ने राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद हिन्दू व्यवस्था के साइड इफैक्ट को बैलेंस करने के लिए ही बाबा साहब अंबेडकर का नाम सार्वजनिक कार्यक्रमों में भगवान की तरह जपना शुरू किया था। एक समय था जब कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने उ0प्र0 में सरकार बनाई थी। लेकिन वर्ण व्यवस्थावादी कुछ महिनों बाद ही पिछड़े वर्ग के नेता के झण्डे तले काम करने की वजह से विद्रोह करने लगे थे। इसके चलते कल्याण सिंह को जब हटना पड़ा तो ओबीसी ने बहुतायत में बीजेपी से मुंह मोड़ लिया और राम प्रकाश गुप्ता व राजनाथ सिंह के रूप में सवर्ण मुख्यमंत्री लाने की लालसा के चलते यूपी में भाजपा लम्बा राजनैतिक वनवास झेलने को अभिशप्त हो गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता की कोई बहुत बड़ी लहर नहीं थी। यह माना जा रहा था कि भाजपा मोदी की दम पर इतना कुछ कर लेगी कि अपने सहयोगियों के साथ सरकार बना ले। लेकिन मोदी ने पिछड़ा गर्व की ग्रंथि सहलाने की जो रणनीति चनावी सभाओं में अख्तियार की उससे सर्वाेच्च पद पर अपने आदमी को देखने की खातिर ओेबीसी का जबरदस्त ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ और भाजपा ने आशातीत बहुमत हासिल कर दिखाया। चूंकि देश में सबसे ज्यादा आबादी ओबीसी की है और किसी व्यवस्था को चलाना है तो समाज के बहुसंख्यक वर्ग की भागीदारी उसमें सुनिश्चित की जानी चाहिए।


लेकिन संघ परिवार भागीदारी के सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखता। कुछ जातियों की श्रेष्ठता की अवधारणा की वजह से वह ऐसे विचारों को बल देता है, जो प्रतिनिधित्वपूर्ण राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ है। संघ के विचारों में शूद्रों का स्थान सुग्रीव परम्परा में हैे यानी ओबीसी, एससी, एसटी के लोग अपने अधिकारी की उद्धत मांग से अपना स्वरूप बिगाड़ने की बजाय कृपा पात्र बनकर कार्य करें, तभी वे स्वीकार्य हैं। उ0प्र0 में एक बार इस जिद का कड़वा स्वाद कल्याण सिंह के समय चखकर भी संघ ने सबक नहीं लिया। इसलिए यूपी में सवर्ण मुख्यमंत्री के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी सवर्ण नेता की ताजपोशी से उसने परहेज नहीं किया। ऐसे भेदभावकारी विचारों का ही परिणाम है कि भाजपा के युवा समर्थक प्रशासन में भागीदारी और प्रतिनिधित्व की अहम जरूरत को अनदेखा कर आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ विष वमन में जुटे हुए हैं। जबकि वे अतीत को देख चुके हैं। जब बहुसंख्यक वर्ग को हाशिए पर रखे जाने की वजह से देश के प्रति उसकी उदासीनता बाहरी आक्रमणों की सफलता और विदेशियों के शासन की दीर्घायु की वजह बना।


योगी सरकार भले ही न चला पाएं लेकिन हिन्दुत्व के एजेण्डे को धार देने वाली ऐलानियां गर्जन-तर्जन करने में कोई संकोच महसूस नहीं करते। इसलिए विकास और सुशासन की बातें करके हिन्दुत्व से किनारा करने लगे मोदी संघ की निगाहों से उतर रहे हैं जबकि सुशासन की चिन्ता छोड़कर उकसाने और आक्रामक अंदाज वाली भाषणबाजी में पूरा जौहर दिखाने की आदत की वजह से योगी के नम्बर संघ में काफी बढ़ चुके हैं और उन्हें हिन्दुत्व की राजनीति के सबसे मजबूत व विश्वसनीय चेहरे के रूप में तेजी से प्रमोट किया जा रहा है।


रणनीति के तहत ही अयोध्या और चित्रकूट में भव्यतापूर्ण कार्यक्रम योगी ने बनाए ताकि उनके लाल कालीन के नीचे जातिवाद और सरकारी अव्यवस्थाओं के कारण उपज रहे असन्तोष की गर्द को दबाया जा सके। हालांकि उनका अयोध्या कार्यक्रम सवालों के भी घेरे में आ गया है। अयोध्या में मुख्य दीपावली के एक दिन पहले उन्होंने वनवास पूरा करके लौटे भगवान राम के राज्यारोहण की लीला को सजीव किया। वे और राज्यपाल राम नाईक पुष्पक विमान की तरह सजे हैलीकाप्टर से पहुंचे राम और लक्ष्मण की अगवानी के लिए गुरू वशिष्ठ और मुनि विश्वामित्र के रूप में उपस्थित हुए। इस दौरान कार्यक्रम स्थल रामकथा पार्क में भीड़ पर हैलीकाप्टर से फूल बरसाए गए। पूरी अयोध्या नगरी भगवान राम की अगवानी के लिए त्रेता युग की तरह सजाई गई थी। हालांकि राम ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं या रामकथा एक मिथक है इसे लेकर अलग-अलग तरह की धारणाएं हैं। लेकिन कथाओं के आधार पर त्रेता में राम के राज्याभिषेक के लिए पहुंचने पर हुई तैयारियों की कल्पना को मूर्त रूप देते हुए पूरी नगरी में तोरण द्वार बनाए गए थे। सड़कों पर महिलाओं ने जगह-जगह रंगोली बनाकर राम के अभिनन्दन का उल्लास प्राप्त किया। शाम को सरयू तट पर एक लाख इकहत्तर हजार से अधिक दीप जलाए गए। लेकिन सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या धार्मिक मान्यताएं नरक चैदस के दिन इस तरह के दीप प्रज्ज्वलन की इजाजत देती है।

गौरतलब यह है कि अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक भी दिन अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए नहीं पहुंच सके। इस तरह की तुलनाएं मीडिया में प्रस्तुत कराई गईं। क्या इसका कोई निहितार्थ हो सकता है। अयोध्या मान्यता के मुताबिक भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है तो चित्रकूट उनकी लीलाभूमि। सो योगी दीपावली बाद चित्रकूट में भी दर्शनों के लिए पहुंचे। फैजाबाद-अयोध्या और मथुरा-वृंदावन को नगर निगम का दर्जा देकर भी उन्होंने अपने एजेण्डे को स्पष्ट किया था। सांस्कृतिक गौरव की बहाली का अपना महत्व है लेकिन अगर प्राथमिकता वाले कार्याें में सरकार अपने को खरी साबित करे तो यह कदम सकारात्मक उपलब्धि के रूप में नवाजे जा सकते हैं। एकांगी तौर पर क्षेपक कार्यों में लीनता दिखाकर योगी कहीं न कहीं इस मामले में पिछड़ रहे हैं। फिलहाल भावनात्मक राजनीति की बयार बहाकर स्थानीय निकाय चुनाव और गोरखपुर सहित प्रस्तावित कुछ लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव के अपनी सरकार के पहले लिटमस टैस्ट में उन्हें कोई कामयाबी मिलती है या नहीं यह देखने वाली बात होगी।


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