कोविंद में क्या है दलित कार्ड के नाम पर !

By: jhansitimes.com
Jun 23 2017 09:18 am
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) दलितों के प्रश्न पर बाबा साहब डा. अंबेडकर महात्मा गांधी के बेहद मुखर आलोचक रहे थे। वैसे मूल रूप से आरएसएस और भाजपा का बाबा साहब से कोई लेना-देना नहीं रहा है लेकिन आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाबा साहब का जाप कुछ ज्यादा ही कर रहे हैं बल्कि उन्होंने इस होड़ में जनसंघ के मानस पिता माने जाने वाले व्यक्तित्वों तक को भुला दिया है। फिर भी उन्होंने बाबा साहब को शायद ही अभी तक बहुत पढ़ा हो। प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के बाद भारतीय सामाजिकता के व्यापक अनुभव से उनकी सहज चेतना को यह इल्हाम हुआ कि अगर शूद्र होने के बावजूद वे आजादी के इतने कम दशकों में भारत के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर पहुंच गये हैं तो कहीं न कहीं इसके पीछे वह संविधान है, जिसकी आत्मा बाबा साहब द्वारा गढ़ी गई है। वे बाबा साहब के संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले और भी कुछ ऐसे लोगों के कृतज्ञ हैं जिन्हें सामाजिक न्याय का कारवां ईमानदारी से आगे ले जाने की वजह से इतिहास में विवादित करार दिया जा चुका है,लेकिन मोदी के लिए उनका नाम लेना आत्मघाती होगा इसलिए रेडियो पर मन की बात लोगों से कहने वाले मोदी यह बात अपने मन में ही रखने को विवश हैं।

तो बाबा साहब को गांधीजी से इस बात पर चिढ़ थी कि वे दलितों की करुणा की वस्तु समझते हैं जबकि दलितों को भी आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए। क्या दलित कार्ड के नाम पर राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का नाम आगे बढ़ाकर इस कसौटी पर खरे रहने की कोई ईमानदार कोशिश नजर आती है। यह संयोग है कि बाबा साहब की दलितों में गहराती पैठ को डायल्यूट करने के लिए कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने बाबू जगजीवन राम का अवतार राजनीति में दलित जमूरे के रूप में कराया था और अब पुत्री मीरा कुमारी को कांग्रेस भाजपा के दलित कार्ड से ज्यादा सुर्ख दलित कार्ड चलने के बतौर सामने लायी है जबकि दोनों के ही दलित कार्ड बदरंग हैं। जिससे कौन किसको काटेगा, यह प्रश्न अप्रासंगिक दिख रहा है।

लेकिन जहां तक बाबू जगजीवन राम की बात है, उन्होंने बाद में राजनीति में कुछ-कुछ नमक हराम फिल्म के राजेश खन्ना जैसा रोल परिवर्ती दौर में किया। एक ऊंचाई छू लेने के बाद उन्होंने यह साबित करना शुरू कर दिया कि वे सिर्फ एक कोटे की पूर्ति भर के पात्र नहीं हैं बल्कि उनका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है जो समकालीन तमाम राजनेताओं पर बहुत भारी है। फिर चाहे बात अकादमिक योग्यता की हो या राजनीतिक और प्रशासनिक योग्यता की। इसलिए जनता पार्टी बनने पर प्रधानमंत्री पद की मेरिट में वे सबसे ऊपर के दावेदार थे लेकिन उन्हें नहीं बनने दिया गया। उनके साथ साजिश हुई जो ब्राह्मणों ने नहीं कुलक जातियों ने की थी।

बाबू जगजीवन राम को तब बाबा साहब बहुत याद आये होंगे जब जनता पार्टी के समय ही बनारस में उनके अनावरण के बाद अपवित्र करार दी गई प्रतिमा को गंगाजल से धोने का विद्रूप प्रहसन रचा गया। जिस सामाजिक समरसता के लिए बाबा साहब के समानांतर खड़े होने की भूमिका स्वीकार कर बाबू जगजीवन राम ने एक दौर में वर्ण व्यवस्था के पुरोधाओं के सामने स्वामी भक्ति का कीर्तिमान स्थापित किया था उसका कितना पीड़ादायक इनाम उस असहिष्णु तबके से उन्होंने पाया।

1980 में बाबू जगजीवन राम इन अनुभवों के चलते प्रतिनायक का चोला उतारकर बाबा साहब के अवतार के रूप में परिवर्तित होने लगे थे और तब जनसंघ का नया संस्करण अटल जी भारतीय जनता पार्टी के नाम से सामने लाये। अटल जी ने नई पार्टी के नामकरण से ही अपने निहितार्थ स्पष्ट कर दिए थे। इसी का नतीजा था कि बाबा साहब की दलितों को भी आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय के अधिकार की वकालत को तसलीम करते हुए उन्होंने लोकसभा का मध्यावधि चुनाव बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करते हुए लड़ने का ऐलान किया। इसमें जोखिम पहले से तय था इसलिए उनका निर्णय भाजपा के लिए अनिष्टकारी साबित हुआ पर अटल जी का यह एक ऐसा निर्णय था जो ऐतिहासिक दर्जा रखता है और कभी भारत में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अपनी तार्किक परिणति पर पहुंची तो इस निर्णय की वजह से उसका एक अध्याय निश्चित रूप से अटल जी के नाम होगा।

टाइम पत्रिका सहित लोकप्रियता के अंतरराष्ट्रीय नंबरों के मायाजाल में निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेई से बहुत आगे निकल गये हैं, लेकिन नशीले उन्माद का खुमार जब उतरेगा और इतिहास आगे चलकर ठंडे दिमाग से विवेचन करेगा तो अटल जी के सामने मोदी का व्यक्तित्व बहुत बौना आंका जाएगा। इसलिए अटल जी जितना बड़प्पन तो मोदी से कभी भी अपेक्षित नहीं हो सकता, लेकिन अपने अहंकार की तृप्ति के लिए महामहिम के पद को भी बहुत बौना बनाने की जो हिमाकत की गई है उसे किसी भी तरह से महिमामंडित नहीं किया जा सकता। यह पीएम मोदी का निजी प्रयोजन है, जिसे ग्लोरीफाई करने के लिए उन्होंने दलित कार्ड का नाम दिलवा दिया क्योंकि कैचवर्ड गढ़ने में उनका कोई सानी नहीं है। तीन वर्ष के अपने कार्यकाल में उपलब्धि के बतौर उन्होंने कुछ संजोया है तो यही कि कैचवर्ड गढ़ने में उनसे ज्यादा महारत न किसी को है और न रही थी।

विपक्ष भी दलित कार्ड के नाम पर उनके झांसे में आ गया, जिससे उसका चाल, चेहरा सब कुछ गड़बड़ा गया। रामनाथ कोविंद का प्रोफाइल देखें और अभी तक जितने राष्ट्रपति हुए हैं उनसे मिलान करें तो देश के साथ जो छल किया गया है वह अपने आप स्पष्ट हो जाएगा। लोग इंदिरा गांधी द्वारा राष्ट्रपति बनाये गये ज्ञानी जैलसिंह से उनकी तुलना करके मौजूदा पीएम के पाप को ढांकने की कोशिश करते हैं। लेकिन जैलसिंह और रामनाथ कोविंद की कोई तुलना नहीं हो सकती। पंजाब के मुख्यमंत्री और कठिन दिनों में देश के ताकतवर गृह मंत्री के रूप में काम करने का ज्ञानी जैलसिंह के पास विलक्षण तजुर्बा था और राष्ट्रपति के कार्यकाल में उन्हें जिन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा वैसा शायद ही किसी राष्ट्रपति ने किया हो। तब तो उनकी अभिभावक मानी जाने वाली इंदिरा जी भी इस दुनियां में नहीं बची थीं। फिर भी उन्होंने अभूतपूर्व धैर्य का परिचय दिया और अत्यंत धर्मनिष्ठ होते हुए भी देश के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने जो भूमिका निभाई उसका कोई सानी नहीं हो सकता। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वे भी बहुत आहत हुए थे। उस समय भावुकता में महत्वपूर्ण पद पर आसीन कई सिख व्यक्तित्व पद छोड़कर बगावती भाषा बोल गये थे। ज्ञानी जैलसिंह ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने गये और बहुत रोये। लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति पद छोड़ने की घोषणा करके देश के सामने संकट पैदा नहीं होने दिया। उन्हें ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर बहुत वेदना थी, जिसके चलते बहुत से लोग इंदिरा जी की हत्या के बाद उनके बारे में प्रतिशोधपूर्ण कदम उठाने का अनुमान लगा बैठे थे, लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं को आड़े नहीं आने दिया। राजीव गांधी के सोवियत संघ से वापस लौटने तक उन्होंने इंदिरा गांधी की मृत्यु की औपचारिक घोषणा को रोके रखा और राजीव के वापस आते ही प्रधानमंत्री पद पर उनकी शपथ करा दी। यह केवल उन्होंने निजी वफादारी के लिए नहीं किया बल्कि उन्होंने सर्वोच्च राष्ट्रीय हित देखा। उन्हें ठीक परख थी कि ऐसे नाजुक हालातों में देश को एकजुट बनाये रखने के लिए नेहरू-इंदिरा परिवार के उत्तराधिकारी को ही सत्ता की बागडोर सौंपना उचित है और उनका यह निर्णय पूरी तरह सही साबित हुआ।

केके तिवारी और कल्पनाथ राय जैसे हुल्लड़बाजों ने जब राजीव गांधी के प्रति स्वामी भक्ति दिखाने के लिए राष्ट्रपति पद की मर्यादा को बार-बार तार-तार करना शुरू कर दिया तो लोकसभा में 542 में से 410 सीटों के अभूतपूर्व बहुमत के आधार पर चल रही राजीव गांधी की निरंकुश सत्ता को पोस्टल बिल रोकने जैसे कदमों से उन्होंने जता दिया कि राष्ट्रपति की ताकत क्या होती है। उनके जमाने में उनकी असंतुष्टि का लाभ उठाकर विद्याचरण शुक्ला जैसे नेताओं ने उनके हाथों राजीव गांधी को बर्खास्त कराकर खुद प्रधानमंत्री बन जाने का ताना-बाना बुना लेकिन उनका गुस्सा केवल राजीव गांधी को चेताने तक सीमित रहा, वे इस साजिश में कदापि शामिल नहीं हुए क्योंकि उन्हें मालूम था कि इससे देश की स्थिरता प्रभावित होगी। क्या रामनाथ कोविंद कठिन परिस्थितियों में इतनी सूझबूझ और निर्भीकता से राष्ट्रपति पद का दायित्व निभा पाएंगे, हालांकि इसकी परीक्षा तो कभी ऐसा अवसर आने पर ही होगी, लेकिन अभी तक की उनकी स्थिरप्रज्ञ जैसी उदासीन कार्यशैली से उन पर प्रथम दृष्टया इस मामले में भरोसा किया जाना संभव नहीं है।

इसलिए मोदी के झांसे में फंसकर राष्ट्रपति पद को जातिगत समायोजन के चश्मे से देखने की बजाय कांग्रेस को अर्हता के मुद्दे के साथ सरकार के विरोध में आगे आना चाहिए था। हालांकि कांग्रेस ने मीरा कुमार की जो उम्मीदवारी तय की है उसमें इसका पुट है, लेकिन संवैधानिक मामलों की उनकी जानकारी और लोकसभा स्पीकर के रूप में कार्य करने के उनके अनुभव का पक्ष दलित कार्ड बनाम दलित कार्ड की बहस में उलझ जाने की वजह से गौड़ हो गया है। कुल मिलाकर राष्ट्रपति पद पर सर्वानुमति नहीं बन पा रही तो कोई बात नहीं है लेकिन इसमें टकराव का जो सैद्धांतिक धरातल तय हुआ है वह इस सर्वाधिक गरिमापूर्ण चुनाव की गरिमा के पूरी तरह प्रतिकूल है। 


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