मायावती किसकी, CBI जिसकी!

By: jhansitimes.com
Jun 25 2019 07:21 pm
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बशीर अहमद बद्र का एक शेर है दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुजांइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जायेतो शर्मिंदा न हो। 19 अप्रैल को मैनपुरी में सपा बसपा की मेगा रैली में जब 02 जून 1995 के लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड के बाद सार्वजनिक मंच पर मुलायम सिंह यादव मायावती के सामने हुए तो मंजर कुछ ऐसा ही था। इस दौरान मुलायम सिंह के मन में शायद पछतावे जैसा कोई एहसास उभरा और भावुक होकर उन्होंने भाषण में अखिलेश के लिए कहा कि वे अब जीवन भर उनका आदर करने में कमी न आने दें। मायावती उस दिन एकदम बदली सी थी। उन्होंने बहुत बड़प्पन के साथ इस सीन को सहेजा था। उम्मीद नही की गई थी कि यह कुछ दिनों का मेला साबित होगा और मायावती फिर पुराने चोले में अपनी वापसी कर लेंगी जहां लोकलाज, भावनाए जैसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं है।
बहरहाल मायावती ने अब सपा के साथ गठबंधन की सारी संभावनाओं को पूरी बेदर्दी के साथ कुचलकर अखिलेश यादव को एक और शर्मिदगी में धकेल दिया है। उनके फैसलों पर नादानी के ठप्पे लगाने के लिए बैठे उनके परिवार से लेकर बाहर तक के विरोधियों को ताने मारने का एक मौका फिर मिल गया है। यहां तक कि उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी शुरू से गठबंधन के पक्ष में नहीं थे और बाद में जब नतीजे निराशा जनक आये तो एक बार फिर उन्होंने इसे लेकर अखिलेश पर गुस्सा उतारा था। मायावती गठबंधन तोड़ देती लेकिन रिश्तों का लिहाज बनाये रखती तो भी अखिलेश के लिए गनीमत रहती लेकिन मायावती ने उनके पिता और उनके प्रति विष वमन करके उनकी फजीहत ही कर दी। जलालत में डूबे अखिलेश को अब अपना चेहरा बचाने के लिए शब्द ढ़ूढ़े नहीं मिल रहे हैं।
लोकसभा चुनाव में सपा बसपा गठबंधन भले ही बुरी तरह नाकामयाब हो गया हो लेकिन जब तक इसकी गुजांइश बरकरार थी तब तक कटटरवादी सवर्ण तबका सशंकित बना हुआ था। मायावती ने अब इस तबके को आराम की नींद सोने का मौका दे दिया है। दूसरी ओर किसी भी मिशनरी जकड़न से आजाद मायावती के उच्छृखंल सोच की उड़ान एक बार फिर अपने ठिये के लिए सवर्ण समर्थन की टहनियां तलाश रही है। सपा को पूरी ताकत से धिक्कारने के पीछे उनके रणनीतिक प्रयोजन स्पष्ट हैं। उन्हें उम्मीद है कि इसके बाद बसपा के माध्यम से भी अपने वर्चस्व को बुलंद करने का भरोसा सवर्णो में पहले की तरह जगाने में उन्हें कामयाबी मिलेगी। उत्तर प्रदेश में होने जा रहे एक दर्जन विधानसभा उपचुनावों में मायावती की रणनीति का रंग दिखाई दे सकता है। इन उपचुनावों में अनुमान है कि मायावती सबसे ज्यादा दाव सवर्ण उम्मीदवारों पर लगायेगीं जो टिकट की बोली लगाने में भी सबसे ऊपर जाने में सक्षम होते हैं।
उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा झगड़ा मुस्लिम मतों की जागीरदारी के लिए है। लोकसभा चुनाव में मायावती को इसे लेकर काग्रेस से खतरा था इसलिए वे भाजपा से ज्यादा काग्रेस पर हमलावर रहीं उनके इस रूख का कम फायदा भाजपा को नहीं मिला। मायावती के इस रूख की वजह से भाजपा का यह प्रचार असरदार हो गया कि उसकी मुख्य प्रतिद्वंदी काग्रेस को ज्यादा सीटें मिल गई तो देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो जायेगी क्योंकि दूसरे बड़े संभावित दलों और गठबंधनों में काग्रेस की स्वीकार्यता नहीं है जबकि अकेले दम पर बहुमत बटोर लेने की उसकी हैसियत नहीं है। फ्लोटिंग वोटर इस धारणा के चलते भाजपा के पाले में चले गये। अब मुस्लिम मतों पर एकछत्र कब्जेदारी के लिए ही मायावती समाजवादी पार्टी को खलनायक साबित करने में कसर नहीं छोड़ रही हैं। हालांकि इसका कितना फायदा वे उठा पायेंगी यह भविष्य के गर्भ में है।
मायावती इस बात पर गौर नहीं कर रही हैं कि राजनीति वैचारिक पक्ष की ओर चली गई है जिसकी पूर्ति के लिए सत्ता एक उपकरण है यह समझदारी मतदाताओं में पनप चुकी है। भाजपा ने अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार के पक्ष में जनमत संगठित कर लिया है और उसकी सरकारें उस एजेण्डे को पूरी निष्ठा के साथ लागू कर रहीं हैं। ऐसे में मतदाता पुनर्विचार के लिए तब बाध्य हो सकते हैं जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बहुसंख्यक आबादी के लिए पुरजोर तरीके से गलत साबित किया जाये लेकिन अगर जाने अनजाने में दूसरी पार्टियां भी कोई जोखिम न उठाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही पोषण करने में लग जाये तो मतदाता स्वाभाविक रूप से ओरिजनल की ओर ही मुखातिब रहेगा न कि कार्बन कापी के चक्कर में पड़ेगा। यह बात बसपा के भी समझने की है और सपा  के भी।
उधर काग्रेस नये सिरे से खड़े होने के प्रयास में जुटी है। उत्तर प्रदेश में इसकी कमान स्वयं प्रियंका गांधी संभाले हुए हैं। अगर वे जमीनी स्तर पर संगठन में नई हरियाली पैदा कर पाती हैं तो मुस्लिम वोटर की पहली प्राथमिकता काग्रेस हो सकती है जिसकी निगाह में सपा और बसपा की कार्यप्रणाली बहुत संदिग्ध साबित हो चुकी है। साथ ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पूरे फाॅर्म पर आने के बाद सामाजिक द्वंद्वात्मकता का प्रखर होना तय है क्योंकि सत्ता और व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का सवाल अस्त व्यस्त होने से असंतोष बढ़ेगा और हिन्दुत्व के नारे के सम्मोहन पर भारी पड़ जायेगा। मायावती में इतना धैर्य नहीं है कि वे इसकी प्रतीक्षा में अपनी पार्टी के उसूलों पर कायम रहें। यहां तक कि समाजवादी पार्टी का रूख भी प्रतिरक्षण शक्ति में लगातार हृास की वजह से ढ़ुलमुल हो चुका है। काग्रेस ने लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण में इस अदृश्य अंतर्विरोध को मददे नजर रखते हुए बिसात बिछाई थी अगर इसके पीछे कोई तात्कालिक फार्मूलेबाजी न होकर नीतिगत मंतव्य है तो अगली योजनाओ में वह इसकी झलक और पुख्ता तरीके से देगी और इन कोशिशों से काग्रेस नया गुल खिलाने की स्थिति में पहुंच सकती है। अगर वर्तमान दल इस मामले में राजनीतिक साहस नहीं दिखाते तो सामाजिक अंतर्विरोधो के न्यायोचित समायोजन के लिए नये दल का प्रादुर्भाव अवश्यम्भावी है।
 


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