यूपी में अमित शाह के लिए क्यों है बड़ी चुनौती

By: jhansitimes.com
Jul 09 2018 09:14 am
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH) सामाजिक आधार पर भाजपा की हालत पतली होती जा रही है। जिससे सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी जैसे उसके सहयोगी बेलगाम होने लगे हैं। यहां तक कि पार्टी के ‘कुजात’ वर्ग से आने वाले कतिपय सांसद और विधायक भी खूटा तुड़ाने का उपक्रम करने लगे हैं। लोक सभा चुनाव के पहले का यह परिदृश्य भाजपा के लिए चिंता का विषय है। चूंकि सवर्ण आज भी पूरे समाज पर मानसिक प्रभुत्व बनाने की स्थिति में है। लेकिन इसके बावजूद उनकी संख्या अल्पतम होने के तथ्य को अनदेखा नही किया जा सकता। इसलिए चुनाव जीतने में सिर्फ उन्हीं के सहयोग और आशीर्वाद के भरोसे नही रहा जा सकता।

उत्तर प्रदेश में हाल में हुए उप चुनावों में इसकी बानगी देखने को मिल चुकी है। सामाजिक समीकरण कमजोर होने की वजह से ही भाजपा को तीन लोक सभा और एक विधान सभा उप चनाव में ताबड़तोड़ हार का सामना करना पड़ा। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को सारे देश में अभेद्य और बेजोड़ स्टार प्रचारक के रूप में स्थापित करने की कोशिश हुई है। लेकिन अपने ही प्रदेश में उनका जादू नही चल पा रहा। जिससे इन प्रयासों को गहरा धक्का लगा है।

उत्तर प्रदेश जनता दल की सरकार के समय से ही सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला बना हुआ है। मण्डल बनाम कमण्डल के द्वंद के चलते भाजपा को इसी कारण 2014 तक राज्य में लाले पड़ जाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा। लेकिन सन 2014 के लोक सभा चुनाव में पासा पलट गया जब पूरे प्रदेश में भाजपा को दिग्विजयी सफलता मिली। तत्कालीन सरकारों के जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण के प्रचार में सभी तबकों में इतनी ज्यादा असुरक्षा भर दी कि हिंदू समाज में सारे अंतर्विरोध आप्रासंगिक हो गये और दलित पिछड़े भी प्रदेश की स्थितियों से छुटकारे के लिए भाजपा के साथ लामबंद होना अपरिहार्य मान बैठे। एक होता है तार्किक समर्थन और दूसरा अन्य समर्थन जिसे उन्माद कहते हैं। सारे देश की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के लिए उन्मादी समर्थन जुट गया। जिसकी काट अखिलेश लोक सभा चुनाव के बाद विकास के लिए स्वतंत्र रूप से फैसले करने के बावजूद नही ढूढ़ पाये।

लेकिन धर्म आधारित राजनीतिक ज्वर के साथ-साथ सामाजिक इंजीनियरिंग की रणनीति भी भाजपा ने अख्तियार की थी। जिसके तहत केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह आभास कराया था कि अगर उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार आई तो सत्ता की बागडोर भी उन्ही को सौंपी जायेगी। बाद व्यक्तिगत केशव प्रसाद की नही, नेतृत्व पिछड़े चेहरे को सौंपने की प्रतिबद्धता की थी जिसके पीछे पार्टी का अपना अनुभव भी था। कल्याण सिंह से सत्ता छीनने बाद पार्टी को प्रदेश में लगातार पतन का सामना पिछड़ों में अविश्वास हो जाने के कारण करना पड़ा था। लोकतंत्र के कारण आई जागृति की वजह से कोई कौम अब केवल भक्ति तक ही अपने को सीमित नही रख सकती। व्यवस्था में भागीदारी और पकड़ की वास्तविक महत्वाकांक्षा के रहते भक्ति का भावनात्मक ज्वर क्षणिक सिद्ध होना अपरिहार्य है।

केशव प्रसाद मौर्य को न केवल मुख्यमंत्री नही बनाया गया बल्कि प्रदेश अध्यक्ष पद भी उनसे ले लिया गया। सरकार और संगठन दोनों की कमान सोशल इंजीनियरिंग का सबक भुलाकर सवर्ण नेताओं के हाथ में सौंप दी गई। सिलसिला यही तक सीमित नही रहा। पिछड़े और दलित मंत्रियों को महत्वपूर्ण विभाग देने से परहेज किया गया। उस पर तुर्रा यह है कि अपने विभागों में भी सवर्ण नौकरशाही की वजह से वे मनमाफिक काम नही कर पा रहे। प्रशासनिक निर्धारण में डीएम, एसपी से लेकर थानेदार स्तर तक पिछड़ों और दलितों का प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक स्तर तक सीमित कर दिया गया। इस तरह धर्म की आड़ ने प्रभुत्व पर आधारित वर्ण व्यवस्था को एक बार फिर अमल में लाने की चेष्टा उजागर होने लगी। जिसमें सपा-बसपा के गठबंधन की सुगबुगाहट उददीपन का काम कर रही है। उप चुनावों में बहुजन समाज के ध्रुवीकरण ने नेताओं पर गठबंधन को फलित करने के लिए दबाव बनाया जो अनुकूल परिणाम आने पर और वजनदार हो गया। यही वजह है कि सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने कह दिया है कि बुआ जी से गठबंधन जरूर होगा भले ही सपा को इसमें घाटा झेलना पड़े।

अमित शाह अभी मिर्जापुर और आगरा में बैठकें करके गये हैं। उन्हें इनमें पार्टी के सिटिंग सांसदों के बारे में बहुत ही खराब फीड बैक मिला है। उन्होंने लगभग 28 सांसदों के टिकिट काटने का संकेत दिया है। इनमें ज्यादातर दलित और पिछड़े समुदाय के हैं। दरअसल सांसदों के मामले में उनकी व्यक्तिगत गलती के साथ-साथ एक स्थिति यह भी है कि भाजपा में दलित और पिछड़े समाज का नेता माननीय होकर भी पार्टी का नेता नेता नही बन सकता। अगर वह ऐसा करता है तो उसे अघोषित तौर पर ढीठ करार दे दिया जाता है। उसे तो मो सम दीन न दीन हित...... की हैसियत में रहना आना चाहिए तभी भाजपा में उसकी गुजर है। सीतापुर जिले के एक विधायक ने शिकायत की कि अपनी सुरक्षा से जुड़े मामले में एसपी ने उनकी फरियाद सुनने की बजाय उनका फोन काट दिया क्योंकि उन्होंने एसपी को चरण स्पर्श नही कहा था। सत्ता में आने के बाद भाजपा द्वारा जिस तरह की मानसिकता को पोषित किया गया है उसके कारण कई डीएम और एसपी अपेक्षा रखते हैं कि दलित और पिछड़े कार्यकर्ता माननीय बन जाने के बाद भी संस्कारित रहे यानि उनके चरण स्पर्श के लिए उन्हें देखते ही लपकें। केवल ज्योतिबा फुले और अशोक दोहरे ही इस माहौल में घुटन महसूस नही कर रहे। इस दंश को कल्याण सिंह जैसे नेता भी महसूस करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की जयंती पर राजस्थान के राज्यपाल के संवैधानिक मर्यादा के बने पद पर रहने के बावजूद उन्होंने जो भाषण दिया वह गौरतलब है। सामाजिक भेदभाव के खिलाफ गुबार निकालने में उन्होंने कोई कसर नही छोड़ी। उन्होंने कहा कि शीर्ष पदों पर तो पिछड़ों का सफाया है ही डीएम, एसपी और थानेदारों की नियुक्ति में भी उनकी हैसियत क्या रह गई है इसको भी संज्ञान में लेने की जरूरत है। इसको कहते हुए वे इतने अधिक विफर गये कि उन्होंने कह दिया कि हक मांगने से नही मिलता थप्पड़ मारने से लिया जाता है। जो तुम्हें सच्चे दिल से अपनाये उस पर सब कुछ लुटा दो लेकिन जो तिरस्कार करे उसे बर्बाद कर डालो। पिछड़ों और दलितों की कसमसाती भावनाओं की यह अभिव्यक्ति सामने आने के बावजूद योगी सरकार की नीति-रीति में बदलाव के संकेत नही मिल रहे हैं। क्या हिंदू राष्ट्र सचमुच ही वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक शासन है जिसका प्रकटीकरण सोशल मीडिया पर आरक्षण के माध्यम से बनाये गये व्यवस्था के सर्व समावेशी स्वरूप के खिलाफ गाली-गलौज की हद तक विषवमन से हो रहा है।


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