मुलायम सिंह ने लोक सभा में बने रहने की क्यों है फिक्र

By: jhansitimes.com
Jan 23 2018 04:47 pm
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सभी प्रमुख पार्टियों में लोक सभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू हो गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसी जददोजहद के बीच अपनी पत्नी डिंपल यादव के संसदीय कन्नौज क्षेत्र से चुनाव लड़ने की मंशा जता दी है। डिंपल यादव पहले ही कह चुकी हैं कि वे आगे कोई चुनाव नही लड़ेगीं। हालांकि इससे किसी को यह भ्रम नही हो सकता कि परिवारवाद का रिकार्ड बनाने वाली समाजवादी पार्टी अब परिवारवाद से दूर होना चाहती है। दरअसल अखिलेश नये जमाने के युवा राजनैतिज्ञ हैं जो परिवार के साथ मुख्यमंत्री रहते हुए भी समय-समय पर छुटिटयां मनाने के लिए विदेश जाने से नही चूंकते थे। इसलिए परिवार के साथ एंज्वाय करना भी उनकी एक प्राथमिकता है और इसी के अनुरूप उन्होंने चाहा कि उनकी पत्नी राजनैतिक झंझटों की बजाय बच्चों की परवरिश में समय लगायें शायद डिंपल भी इसी पक्ष में होगीं इसलिए कई महीने पहले उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बनाने की घोषणा कर दी थी। इस मामले में अखिलेश अपने पिता से पूरी तरह अलग हैं। जिनके लिए राजनीति परिवारिक जीवन से बहुत ऊपर रही। बल्कि जिनके लिए सब कुछ राजनीति ही रही थी।

अखिलेश ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत कन्नौज से चुनाव लड़कर ही की इसलिए उनके निगाह में यह उनके लिए सबसे महफूज सीट है। हालांकि 2014 के लोक सभा चुनाव में डिंपल को इस सीट पर कब्जा बनाये रखने में नाकों चने चबाने पड़ गये थे। जबकि इसके पहले जब अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके द्वारा खाली किये जाने से उन्होंने कन्नौज उपचुनाव में नामांकन किया था तो उनके सामने प्रतिद्वंदी दलों ने कोई प्रत्याशी खड़ा करने की हिम्मत नही की थी।

इस बीच समाजवादी पार्टी के शाही परिवार में अभी भी सबकुछ ठीक नही हुआ है। शिवपाल सिंह यादव पार्टी में सम्मानित ढंग से अपने समायोजन के लिए छटपटा रहे हैं। मुलायम सिंह भी अखिलेश पर उनके लिए कोई उपयुक्त पद देने का दबाव बना चुके हैं। पर अखिलेश है कि उनको इस मामले में पिता की बात सुनना शायद गंवारा नही है। शिवपाल सिंह भाव दिखाने के लिए कभी अलग पार्टी बनाने की बात कहते है तो कभी कांग्रेस में शामिल होने की। फिर भी अखिलश उन्हें मनाने का कोई जतन करते नजर नही आते। अंत में शिवपाल सिंह यादव ही कह देते है कि वे पार्टी से अलग नही हो रहे हैं इससे उनकी फजीहत बढ़ती जा रही है।

हालांकि शिवपाल ने अभी भी नेताजी यानि मुलायम सिंह को अपना मार्गदर्शक बताना नही छोड़ा है और कह रहे है कि वे जो भी कदम उठायेंगे उसके लिए नेताजी से सबसे पहले अनुमति लेगें। लेकिन इस बार उनके जन्मदिन पर इटावा में मुलायम सिंह के लोगों के नाम से उनके लोगों ने जो हार्डिंग, बैनर, पोस्टर लगवाये उसमें मुलायम को ही गायब कर दिया। दूसरी ओर मुलायम सिंह ने मैनपुरी में समाजवादी पार्टी के टिकट से बिना इस बात की परवाह किये हुए चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है कि अखिलेश शिवपाल के साथ लोकसभा चुनाव में क्या करते हैं। जाहिर है कि वे साफ कर रहे हैं कि अपने बेटे के खिलाफ जाना उनके लिए संभव नही है। भाई को उन्होंने उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है।

अखिलेश ने भी पिता की पार्टी से चुनाव लड़ने की मंशा को हरी झंडी दिखाने में देर नही की। इससे उन्हें अपनी मूल बैल्ट में फायदा होगा जहां गत चुनाव नेताजी की नाराजगी की खबर से लोग उनसे नाराज हो गये थे जिसका खामियाजा उनको भोगना पड़ा था। मुलायम सिंह एक समय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद के दावेदार थे। लेकिन अब उनके मन में किसी ऊंची उड़ान की हसरत बाकी नही रह गई है क्योंकि देश और प्रदेश की राजनैतिक परिस्थितियों में इसका सपना देखने को कोई मतलब नही है। पार्टी की विरासत बेटे को सौंपकर वे निश्ंिचत हैं। लेकिन फिर भी राजनीति से सन्यास लेने की बजाय लोक सभा में बैठकर केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप बनाये रखने का मोह वे इसलिए नही छोड़ पा रहे क्योंकि उन्होंने अगर ऐसी गलती की तो उनके परिवार का भी वही हश्र हो सकता है जो लालू के परिवार का हो रहा है। चाहे उनकी दूसरी पत्नी और उनका बेटा प्रतीक हो या अखिलेश अथवा शिवपाल सिंह भी हों। आय से अधिक संपत्ति के फंदे मे तो सरकार चाह ले उस दिन सभी कस सकते हैं।


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