क्या लोकसभा में 1993 के विधानसभा चुनाव का इतिहास दोहरायेगा सपा-बसपा गठबंधन

By: jhansitimes.com
Mar 05 2019 06:25 pm
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BUNDELKHAND: समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी का चुनावी गठबंधन आगामी लोकसभा चुनाव में केन्द्र एवं सूबे की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि शहर से लेकर गांव गली तक सपा-बसपा का गठबंधन जिस तरह से फिर से पंद्रह पचासी का नारा बुलंद करने में जुट गया है। उससे ऐसे आसार बनते दिख रहे कि सपा-बसपा का गठबंधन फिर से 1993 के विधान सभा चुनाव का इतिहास दोहराने जा रहा है। 

दलित पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों पर पिछले पांच साल में देश भर पर अत्याचार, उत्पीड़न की जो तस्वीर मोदी सरकार के कार्यकाल में देखने को मिली संवैधानिक संस्थाओं को मटियामेल करने का जो खेल खेला गया उससे आम जनमानस अनजान नही है। जिस तरह से सीबीआई, ईडी जैसी संस्थाओं को सरकार के जनविरोधी कार्य कलापों का विरोध करने वाले दलित पिछड़े एवं अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को प्रताड़ित किया गया और उनके हक एवं अधिकारों पर चोट की गई उसके कारण ही प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन सामने आया चूंकि जालौन गरौठा भोगनीपुर लोकसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है। जाहिर है कि इस सीट पर दलित मतदाताओं का अनुपात अधिक है ऐसे में दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक मतदाताओं की एकजुटता भाजपा को नाकों चने चबवाने के लिए पर्याप्त है। क्योंकि जालौन लोकसभा सीट पर दलित पिछड़े एवं अल्पसंख्यक मतदाताओं का गठजोड़ अनायास है। सपा-बसपा गठबंधन को ताकतवर बना देता है। वैसे भी बुंदेलखंउ क्षेत्र को बहुजन समाज पार्टी का गढ माना जाता है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ उसका गठबंधन भाजपा के मुकाबले काफी मजबूत स्थिति में ले जाता है। सपा-बसपा की दोस्ती बुंदेलखंड की जनता पहले भी देख चुकी है। 

1993 के विधान चुनाव में याद करे तो सपा-बसपा के गठबंधन ने बुंदेलखंड में भाजपा पर कहर ढाया था तब एक ही नारा था‘‘मिले मुलायम-कांशीराम हवा में उड़ गये जयश्रीराम,, चूंकि उस समय भाजपा का कमंडल सिर चढ़कर बोल रहा था भाजपा एवं उसके अनुसांगिक संगठनों, कार्यकर्ताओं के द्वारा गठबंधन की खिल्ली उड़ाई जा रही थी और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को गुमराह करने के हररोज नये-नये छोड़ जा रहे थे। बाधी विध्वंस के कुछ ही महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपनी वापिसी का पूरा भरोसा था लेकिन सपा-बसपा के गठबंधन ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। कमोवेश 1993 जैसी स्थिति फिर से सपा-बसपा के साथ आने पर पैदा होती दिख रही है। 

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव जिसमें मोदी लहर का जादू चला और इस लहर में सपा-बसपा का वोट भी भाजपा के खाते में चला गया था लेकिन पिछड़े लोकसभा चुनावों के परिणाम इस गठबंधन को मजबूत स्थिति में खड़ा करते है। क्योंकि 1993 में सपा-बसपा ने गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था जिसमें जालौन जिले की चारों सीटों पर गठबंधन प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी बल्कि पूरे बुंदेलखंड में सपा-बसपा गठबंधन की धूम रही थी इसके बाद हुए विधानसभा लोकसभा चुनावों को सपा-बसपा ने अलग-अलग लड़ा फिर भी हर चुनाव में सपा-बसपा प्रत्याशियों को मिले वोटों की तुलना में भाजपा कहीं नही ठहरती। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए हुए सपा बसपा के गठबंधन के बाद से जिस तरह से दोनों दलों के समर्थकों में जोश और जुनून देखा जा रहा है। उससे लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन से पार पाना भाजपा लेकिन नामुमकिन ही लग रहा है। वह भी ऐसे में जब पूर्व विधायक अजय अहिरवार पंकज को गठबंधन प्रत्याशी घोषित किया गया है। क्योंकि 2007 में विधायक बने अजय अहिरवार की कार्य प्रणाली को लेकर सपा-बसपा के कार्यकर्ताओं में किसी तरह की शक सुब्हा नही है। खासकर प्रत्याशिता घोषित होने के साथ ही उनके पक्ष में सर्व समाज का सकारात्मक रवैया भी भाजपा नेताओं के माथे पर बल पैदा कर रहा है। तो दलित, पिछड़े उवं अल्पसंख्यक वर्ग में मोदी सरकार से पिंड छुड़ाने के लिए जो उल्लास एवं उत्साह है उससे लग रहा है कि यह गठबंधन 1993 के गठबंधन के इतिहास को दोहराने में सफल होगा।


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