अपने ही सवालों से कटघरे में भाजपा और मोदी...बता रहे हैं, प्रधान संपादक के.पी सिंह

By: jhansitimes.com
Dec 12 2017 06:46 pm
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राज्यवादी अस्मिताएं भारत में राष्ट्रीय अस्मिता पर भारी पड़ जाती हैं। जयललिता ने नरेंद्र मोंदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि उन्होंने सभी पड़ोसी शासनाध्यक्षों को इसमें आमंत्रित करने की नीति के तहत श्रीलंका के राष्ट्रपति को भी न्यौता भेज रखा था। यह सामरिक दृष्टिकोण से राष्ट्रीय हित के अनुरूप अपनाई गई रणनीति का तकाजा था लेकिन जयललिता का इसे लेकर प्रकारांतर से मानना यह था कि राष्ट्रीय हितों से उनका क्या लेना-देना, वे पहले तमिल है इसलिए लिटटे के दुश्मन देश को सम्मान उन्हें गंवारा नही है। महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे ने कई बार उत्तर प्रदेश और बिहारी टैक्सी चलाने वालों को खदेड़ने के लिए उनके साथ मारपीट की। जबकि इतिहास गवाह है कि पेशवा द्वारा उत्तर भारत में नियुक्त महाराष्ट्रियन शासकों के प्रति स्थानीय जनता ने कभी क्षेत्रीय अस्मिता का नाम लेकर विद्रोह नही किया था। लेकिन महाराष्ट्रियनों के हितों की रक्षा की उत्कंठा के नाम पर अगर राष्ट्रीय एकता का सत्यानाश हो तो होता रहे उन्हें कोई सरोकार नही। यह महाराष्ट्र के नेताओं ने दिखाया। भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में सुसंगठित करने के प्रयास में यह संक्रीण भावनाएं बहुत बड़ी बाधाएं हैं जो आजादी के तत्काल बाद भाषा विवाद की मुखरता जैसे उपक्रमों के जरिये बहुत प्रखर थीं लेकिन इनकी चिंगारियों को अभी भी पूरी तरह बुझाया नही जा सका है। जो क्षेत्रीय अलगाव की लपटों को सुलगाती रहती हैं।

नरेंद्र मोदी का गृह प्रदेश गुजरात है लेकिन लोक सभा में वे उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसके साथ-साथ वे सारे देश के प्रधानमंत्री भी हैं। इस नाते किसी भी चुनाव में भाग लें, कहीं भी संबोधित करें। उनका संबोधन देश के सर्वोच्च कार्यकारी पदाधिकारी का संबोधन होगा। इसलिए यह बहुत ही दुखद है कि गुजरात में व्यापक और वास्तविक मुददो की बजाय संक्रीण भावनाओं के आधार पर चुनावी मकसद को साधने की कोशिश हो रही है। जिसमें नरेंद्र मोदी ने मर्यादा को लांघने की पराकाष्ठा कर दी है। उन्होंने एक भाषण दिया कि मोराजी देसाई का कांग्रेस ने विरोध किया था इसलिए कांग्रेस गुजरात विरोधी है। क्या घटिया तर्क है। आप जवाहरलाल नेहरू का विरोध कर रहे हैं तो क्या आपको नमक हराम कहा जाये। जिस उत्तर प्रदेश ने आपको अपने सिर पर चढ़ाकर लोक सभा में पहुंचाया आप उसका विरोध कर रहे हैं। क्योंकि जैसे मोरारजी देसाई गुजरात के रहने वाले थे इसलिए उनका विरोध आपने गुजरात विरोध के रूप में परिभाषित कर दिया। वैसे ही चूंकि जवाहरलाल नेहरू उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे इसलिए उनका विरोध उत्तर प्रदेश का विरोध क्यों न कह दिया जाये।

गुजरात में नरेंद्र मोदी ने इस बार जितनी ज्यादा मेहनत की उससे यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी के तेवरों ने उनमें घबराहट भर दी है। फिर भी उन्हें इतना अधीर नही होना चाहिए। बाबा साहब अंबेडकर के नाम का जाप हालांकि वे लोक सभा चुनाव जीतने के बाद से ही बहुत श्रद्धा पूर्वक करने लगे थे। जिसे माना गया था कि दबे-कुचले समाज से आने की वजह से बुलंदी पर पहुंचने के बाद जब उनमें वर्ग चेतना जागृत हुई तो बाबा साहब के प्रति उनके मन में भक्ति भाव उमड़ना स्वाभाविक रहा। अभी तक इसे सकारात्मक स्थिति विकास के रूप में संज्ञान में लिया जाता था। लेकिन गुजरात चुनाव में उन्होंने बाबा साहब के नाम पर जिस तरह की राजनीति की है उससे लगता है कि यह आंकलन सही नही था। वे बाबा साहब को भी केवल रणनीतिक उददेश्यों के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं किसी प्रतिबद्धता की वजह से उन्हें बाबा साहब में कोई अनुराग या आसक्ति पैदा नही हुई है।

राम राज से जुड़ी कथाओं में यह ध्वनित होता है कि वर्ण व्यवस्था की मार्यादा का संरक्षण को इसमें सर्वोपरि स्थान दिया गया है। नरेंद्र मोदी की पार्टी भाजपा राम राज के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि वैसे भले ही भाजपा के लोगों में महात्मा गांधी के प्रति तिक्तता हो लेकिन राम राज की आधुनिक समय में अवधारणा के सूत्रधार बापू ही थे इसलिए मानना पड़ेगा कि इस मामले में भाजपा बापू से ही प्रेरित हुई। गांधी जी के इस आग्रह की वजह से बाबा साहब और उनके बीच कई बार कटुतापूर्ण संवाद हुआ जिसमें गांधी जी ने आरंभ में बहुत ही शालीनतापूर्वक वर्ण व्यवस्था को श्रम विभाजन की आदर्श व्यवस्था के बतौर महिमामंडित भी किया था। यह दूसरी बात है कि 1945 तक आते-आते गांधी जी का हृदय परिवर्तन होने लगा था। उन्होंने एलान कर दिया था कि वे सिर्फ उसी विवाह समारोह में जायेगें जिसमें जोड़ा अंतर्जातीय हो और जाने-अनजाने में वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में उनके द्वारा विभीषण भूमिका को ओढ़ लेना कहीं न कहीं उनकी हत्या की एक बड़ी वजह बना। तो राम राज और अंबेडकर की भक्ति एक साथ कैसे हो सकते हैं। या तो इसके पीछे पाखंड है या नादानी।

वैसे तो भाजपा ने राहुल गांधी से पूंछा है कि वे यह स्पष्ट करें कि वे शिवभक्त है या राम भक्त। भाजपा और मोदी कभी-कभी ऐसे सवाल उठाते हैं कि खुद ही कटघरे में खड़े हो जाते हैं। कहते है कि हिन्दू तो मुगलों द्वारा इस भू भाग के निवासियों को दी गई गाली थी जिसे आज हम अपने पहचान के रूप में अपना चुके हैं और इस गलती को सुधारने की इच्छा शक्ति भी यहां के कर्णधारों में नही बची है। लेकिन जिन्हें हम हिन्दू कहते है, समझते हैं वे असल में सनातनी हैं। भारत में सदियों के इतिहास में धार्मिक उतार-चढ़ावों के बड़े दौर देखे गये। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन पंथ का प्रवर्तन किया और चार शैव धाम बनाये जिन्हें सनातनियों के सर्वोच्च तीर्थ स्थल के रूप में चिन्हित कर दिया। विष्णु के अवतार का एक भी तीर्थ आदि गुरू शंकराचार्य ने इस कोटि में नही रखा है। अब कोई स्वयं-भू सनातनी कर्णधार बहुत भव्य मंदिर बनाने जा रहा हो जो कि शैव पीठ नही है तो उसे बताना चाहिए कि उसे मौलिक तौर पर सनातनी माना जाये या नही। यह कहने की जरूरत नही है कि बहुत ज्यादा भव्य मंदिर में चारों धामों से भी ज्यादा उत्कृष्ट धार्मिक रचना के निर्माण के संकल्प का भाव अपने आप निहित है।

शायद विषयांतर हो गया है। गुजराती अस्मिता यानि राज्यगत अस्मिता पर प्रधानमंत्री की हैसियत में होने के बावजूद बल देने की मोदी की चूंक के क्या परिणाम होगें यह सोचने की जरूरत है। नरेंद्र भाई मोदी ने चुनावी सभाओं में गुजराती अस्मिता का भाव प्रगाढ़ करने के लिए पहला आरोप तो यह लगाया कि जवाहर लाल नेहरू ने षणयंत्र करके सरदार पटेल को प्रधानमंत्री नही होने दिया था। लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें जवाहर लाल नेहरू निर्णायक नही थे। यह तय करने का दारोमदार महात्मा गांधी का था। महात्मा गांधी अपनी पैनी सामाजिक समझदारी की वजह से यह जानते थे कि नवजात राष्ट्र के लिए सर्वस्वीकार नेतृत्व लाजिमी है। जिसमें जाति की भूमिका अहम है। तब गुणों और क्षमताओं के बावजूद इसमें उन्होंने सरदार पटेल पर नेहरू को इसलिए भारी देखा क्योंकि नेहरू ब्राहमण थे। बाद में यह प्रमाणित हुआ कि जब तक सामाजिक न्याय के आंदोलनों ने निर्णायक बढ़त नही ले ली। तब तक जाति के पैमाने को ध्यान में रखे किये गये प्रयोग असफल रहे। जैसे उत्तर प्रदेश में अपनी तमाम खूबियों के बावजूद कल्याण सिंह की सरकार का पतन घर को आग लगाने वाले घर के चिरागों की वजह से ही हुआ क्योंकि ओबीसी को सीएम बनाने का फैसला उस समय के लिहाज से प्री मैच्योर था। अब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद तक पर स्वीकार हैं। क्योंकि देश बदलाव की लंबी प्रक्रिया से गुजर चुका है। दूसरे सरदार पटेल गांधी जी को इतना मानते थे कि उन्हें इस फैसले के खिलाफ बगावत करना तो दूर नेहरू के अधीन काम करने में कोई मलाल दिखाना भी गंवारा नही हुआ। अगर नरेंद्र भाई मोदी को सरदार पटेल को प्रधानमंत्री न बनाये जाने का कोई मलाल है तो उनका क्षोभ गांधी के प्रति होना चाहिए लेकिन वे गांधी जी का नाम वे कैसे ले दें क्योंकि गांधी जी भी तो गुजराती ठहरे।

ठसी संदर्भ में नरेंद्र मोदी का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहिए कि सरदार बल्लभ भाई पटेल बाबा साहब अंबेडकर से चिढ़ते थे न कि जवाहर लाल नेहरू। नरेंद्र भाई लगातार आरोप लगा रहे है कि एक परिवार ने बाबा साहब के नाम को आगे नही बढ़ने दिया। सच्चाई यह है कि जवाहर लाल नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद आदि तमाम कांग्रेस नेताओं की इच्छा न होते हुए भी अपने नेतृत्व वाले अंतरिम मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए बाबा साहब की रजामंदी लेने की पहल की थी। अन्यथ कांग्रेस का रूढ़िवादी तबके ने बाबू जगजीवनराम के माध्यम से मंत्री मंडल में एससी/एसटी का कोटा पूर्ण करने का इंतजाम कर रखा था। सरदार पटेल से बाबा साहब की अक्सर झड़प हो जाती थी क्योंकि सरदार पटेल को लगता था कि बार-बार दलितों के हितों की सुरक्षा की गारंटी मांगकर बाबा साहब देश की जल्द स्वतंत्रता में अवरोध पैदा कर रहे हैं।

समकालीन नेताओं में व्यक्तित्वों का टकराव होता है। लेकिन इतिहास के आगे बढ़ने पर निजी प्रसंग असंगत हो जाते हैं और विचारधारा व प्रवृत्तियों के आधार पर मूल्यांकन की प्रणाली अपनाई जाती है। सामान्य सिद्धांत की अवहेलना करके प्रधानमंत्री ने गांव स्तर की राजनीतिक क्षुद्रताओं का समावेश कर अपने पद और कद की गरिमा का अवमूल्यन किया है। पता नही उनके भक्त इस सच को स्वीकार करेगें या नहीं।


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