अर्श से फर्श पर जा गिरे योगी, आखिर क्यों हुआ ऐसा... बता रहे, प्रधान संपादक के. पी सिंह

By: jhansitimes.com
Apr 12 2018 10:08 pm
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की छवि कुछ दिनों पहले भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सबसे बड़े स्टार के बतौर बन गई थी। उन्हें मोदी के गृह राज्य गुजरात तक में विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी के प्रमुख उद्धारक के रूप में पेश किया गया था। त्रिपुरा में भाजपा को मिली सफलता का सारा श्रेय जैसे उन्ही के खाते में जमा कर दिया गया था। लेकिन इसके बाद ऐसा चक्र चला कि आज योगी आदित्य नाथ वैचारिकी की हालत में हैं। उनकी राजनैतिक सूझबूझ और प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है। केंद्रीय नेतृत्व को बार-बार उत्तर प्रदेश में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। अखिलेश यादव ने तो खुद ही अपने को प्रशिक्षणार्थी मुख्यमंत्री बताकर यह मुहावरा राजनैतिक तौर पर अपने लिए कैश कराने का जरिया बना लिया था। लेकिन योगी में इतनी सहजता नही है कि वे विनम्रता को हथकंडे के लिए इस्तेमाल करने का साहस दिखा सकें। पर जिस तरह से जनमानस में उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लगातार दिशा निर्देशित किये जाने की जरूरत देखी जाने लगी है। उससे उनकी हैसियत का ऐसा अवमूल्यन हुआ है कि उन्हें वास्तव में ट्रेनी मुख्यमंत्री माना जाने लगा है। जिन्हें अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बहुत कुछ सिखाना पड़ेगा।

सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर को योगी आदित्य नाथ के चढ़ते कद को उतारने का श्रेय दिया जाना चाहिए। उनके असंतोष की शुरूआत गाजीपुर के तत्कालीन डीएम के मामले में हुई। जिसे योगी को मैनेज कर लेना चाहिए था लेकिन वे ऐंठ में रहे। योगी आदित्य नाथ के ऊपर उनकी महाराज पहचान हावी थी जो उनमें राजनैतिक गुणों के विकास में बहुत बड़ी बाधा है। मठ के महंत होने के नाते निरंकुश आदर के अभ्यस्त होने के कारण उन्हें राजनीतिज्ञ मुख्यमंत्री की तरह मंत्रियों और विधायकों को साधना नही आता। बल्कि अपने सामने उनका बैठना तक गंवारा नही होता। तमाम विधायक धर्म भीरू है इसलिए वे इस अदब को मानते हैं और मुख्यमंत्री के सामने खड़े रहकर ही अपनी अर्ज सुनाते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री में जब तक विधायकों से आत्मीय संबंध बनाने की कला नही होगी तब तक उसे सुकून के साथ काम कर पाने की आशा नही रखनी चाहिए।

उनके इसी अहंकार को आइना दिखाने के लिए राज्यसभा चुनाव के समय ओमप्रकाश राजभर ने मौके की नजाकत को भांपकर उन पर निशाना साध दिया। राजभर मचल गये और शर्त यह रखी कि राज्यसभा में भाजपा के उम्मीदवारों को उनके विधायकों का समर्थन तभी मिलेगा जब अमित शाह उनसे बात करेगें। इस तरह उन्होंने योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से नकार दिया। अंततोगत्वा अमित शाह ने ही उनसे बात की तभी वे माने योगी की इससे बड़ी तौहीन हुई।

इसी बीच गत 2 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध में दलितों के प्रभावशाली आंदोलन से चिढ़कर प्रदर्शन में शामिल रहे लोगों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में पुलिस सरकार के इशारे पर दुश्मनों की तरह टूटने लगी जिससे एक बार फिर पार्टी के लोगों का गुस्सा योगी के प्रति फूट पड़ा। यह अजीब बात है कि योगी की गोरखनाथ पीठ को जाति बंधन के मामले में उदार माना जाता है। लेकिन सहारनपुर में जब जातिगत दंगा हुआ तो उससे निपटने के योगी के तौर-तरीके से यह धारणा बनी कि गोरखनाथ मंदिर के मौजूदा महंत वर्ण व्यवस्था के मामले में सनातनियों से बहुत ज्यादा कटटर हैं। स्वयं योगी ने अपने ऊपर और मुजफ्फर नगर दंगे के आरोपी भाजपा नेताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमें वापस करा दिये। यह जताकर कि जिन भाषणों को आधार बनाकर वे मुकदमें तैयार किये गये थे उन्हें तूल नही दिया जाना चाहिए। क्योंकि राजनीति में उकसाने वाली बयानबाजी व्यवहारिक रूप से थोथी होती है जिस पर गंभीर होने का कोई औचित्य नही होता। इसी सिद्धांत पर वरुण गांधी के अल्पसंख्यकों के खिलाफ भाषण के मामले में सपा की सरकार ने उन्हें बचा दिया था। जबकि सपा को मुस्लिम परस्त पार्टी माना जाता है। पर योगी कटटरता में बंधे होने की वजह से चंद्रशेखर रावण के मामले में इस सिद्धांत को ध्यान में नही रख सकी और उन पर रासुका लगाकर उन्होंने पराकाष्ठा कर दी। जबकि रावण का भाषण वर्ग विद्वेष भड़काने की प्रकृति की दृष्टि से योगी और मुजफ्फरनगर के भाजपा नेताओं के भाषणों की तुलना में बहुत हल्का होगा।

मुस्लिम मतदाता तो भाजपा के विरोध में लामबंद होते ही हैं। दलितों को भी इसी तरह का व्यवहार अपनाने के लिए बाध्य करना भाजपा विरोधी आधार को बहुत अधिक प्रभावी बना देने के बराबर है। इसलिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में डैमेज कंट्रोल के लिए तत्काल सक्रिय होना पड़ा। बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले, राबर्टसगंज के सांसद छोटेलाल और इटावा के सांसद अशोक दोहरे ने केंद्रीय नेतृत्व से गुहार लगाकर योगी के प्रति अविश्वास के वातावरण को और गहरा दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है और उन्होंने तत्काल उत्तर प्रदेश पहुंचने का कार्यक्रम बना दिया। पहले वे 10 अपै्रल को लखनऊ आने का कार्यक्रम भिजवा चुके थे। लेकिन बाद में उन्होंने इसे एक दिन आगे बढ़ा दिया क्योंकि 11 अप्रैल को महात्मा फुले की जयंती थी। इस अवसर पर महात्मा फुले की प्रतिमा पर माल्यार्पण के लिए वे योगी आदित्य नाथ को साथ ले गये तांकि दलितों की भावना पर मलहम लगा सकें। पर योगी ने मूढ़ता की इंतहा कर रखी है। वैसे तो योगी भी अंबेडकर के नाम का जाप अब करने लगे हैं लेकिन सब जानते है कि यह केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश की वजह से है। अंबेडकर को भी योगी दिल से कटटर मानसिकता के कारण पंसद नही कर सकते। 2 अप्रैल के आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के लिए उनके द्वारा जिस ढंग से पुलिस को शह दी गई उससे दलित विरोधियों का मनोबल बढ़ा है और प्रदेश भर में अंबेडकर प्रतिमाओं को तोड़ने की लगातार घटनाओं के रूप में इसकी प्रतिकिया सामने आई है।

उन्नाव के प्रकरण में भी योगी सरकार तब हरकत मे आई जब अमित शाह ने उन्हें फटकार लगाई। जबकि इससे सरकार की सारी उपलब्धियों पर पानी फिर गया। योगी ने बांगरमऊ के विधायक कुलदीप के भाई अतुल सेंगर को गिरफ्तार कराने के बाद यह मान लिया था कि अब केंद्र की मंशा का अनुपालन हो गया है। इसलिए उन्होंने एक बार फिर आगे की आशंकाऐं नजर अंदाज कर दीं। 12 अप्रैल को हाईकोर्ट में इसके कारण उनकी सरकार को फिर एक बार जलालत उठानी पड़ी। जब हाईकोर्ट ने पूंछा कि राज्य के प्रमुख सचिव और डीजीपी एक घंटे के अंदर बतायें कि कुलदीप सिंह को गिरफ्तार करेगें या नहीं। उन्नाव प्रकरण की असलियत जो भी हो लेकिन इसके उदाहरण से एक बार फिर साबित हो गया है कि योगी में राजनीतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता की हर दर्जें की कमी है। उन्नाव की एसपी पुष्पांजलि और उनके पति गोरखपुर के एसएसपी शलभ माथुर का ट्रेक रिकार्ड कुछ बहुत अच्छा नही रहा। दोनों को बेहद ढीला अफसर माना जाता है। शलभ माथुर दंडात्मक परिस्थितियों में कानपुर और वाराणसी से हटाये गये थे। लेकिन नाकाबिल अफसरों पर योगी सरकार की नजरें इनायत हो रही हैं जो उनकी फजीहत का कारण बन रहे हैं। उन्नाव में भी पुष्पांजलि के एसपी होने की वजह से मामला गलत ढंग से डील हुआ। जांच करने पहुंचे लखनऊ के एडीजी राजीव कृष्ण ने तक प्रत्यक्ष रूप से पुष्पांजलि के ढीले प्रशासन की झलक देखी। जब भारी भीड़ ने उन्हीं को घेर लिया होता। खबर है कि उन्होंने पुष्पांजलि के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर दी है। हालांकि नाकाबिल अफसरों की तैनाती को लेकर कुछ दूसरी भी तरह की चर्चाएं हैं। कहा जा रहा है कि सुनील बंसल तबादला और नियुक्ति इंडस्ट्री चला रहे हैं। जिससे अधिकारियों की पदस्थापना में योगी का कोई रोल नही रह गया है। अगर यह सही है और योगी ने शोपीस मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया है तो यह और भी शर्मनाक है।

अमित शाह ने अपने लखनऊ दौरे में योगी को हिदायत दी है कि वे सहयोगी दलों के साथ हर पंद्रह दिन में बैठक करें तांकि सार्वजनिक रूप से उनके साथ कलह का अवसर पैदा न हो। उन्होंने दोनों उपमुख्यमंत्रियों केशवदेव मौर्य और दिनेश शर्मा के साथ भी मुख्यमंत्री की बैठक कराई। क्योंकि उपमुख्यमंत्री भी योगी से असंतुष्ट हैं। जाहिर है कि यह बैठक उप मुख्यमंत्रियों को और ऊर्जा देगी। जिससे योगी की हनक के लिए मुश्किलें और बढ़ेगीं। अमित शाह के दौरे के बाद से इटावा के सांसद अशोक दोहरे के सुर भी ठीक हो गये हैं। उन्होंने 12 अप्रैल को विपक्ष द्वारा संसद न चलने देने के विरोध में भाजपा के उपवास में भाग लिया। सपा-बसपा गठजोड़ की काट के लिए महादलित और अति पिछड़ों को आरक्षण में अलग कोटा निर्धारित किया जा रहा है। यह मंत्र देने का श्रेय बटोरने भी अमित शाह लखनऊ प्रवास के दौरान पीछे नही रहे।

योगी नरेंद्र मोदी माडल पर काम कर रहे थे जिन्हें दरअसल गुजरात में स्काईलैब की तरह थोपा गया था लेकिन बाद में उन्होंने अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर लीं कि वे गुजरात में सबसे ताकतवर नेता बनने के बाद देश में भी सबसे ताकतवर नेता के रूप में स्थापित करने में सफल रहे। योगी ने बतर्ज मोदी सरकारी कामकाज से ज्यादा हिंदुत्व की जय जयकार और कानून व्यवस्था सुधारने की आड़ में लक्षित एनकाउंटर को अपने एजेंडे में प्रमुखता दी। उन्हें कुछ दिनों इससे बढ़त मिली। मोदी के अगले उत्तराधिकारी के रूप में शुरू में एंटीरोमियों अभियान और स्लाटर हाउस बंद कराने जैसे ड्रामे से उनकी पहचान बनने लगी थी। लेकिन उनके मधुमिलन का यह दौर जल्द ही बीत गया। योगी और मोदी में फर्क यह है कि मोदी ने कभी अपनी यह छवि नही बनने दी कि वे ऊपर से निर्देशित सरकार चला रहे हैं। उन्होंने खुद मुख्तार मुख्यमंत्री की इमेज बनाई। उत्तर प्रदेश में योगी सुनील बंसल के सामने शरणागत है लेकिन यही भूमिका निभाने के लिए जब गुजरात में संजय जोशी को भेजा गया था तो मोदी ने किस तरह चलता कर दिया था यह सबको याद है।

मोदी ने हिंदू नायक बनने के लिए अल्पसंख्यकों के खिलाफ दमन चक्र चलाने के साथ-साथ गुजरात में सरकार की मौलिक प्राथमिकताओं का जिनमें विकास कार्य सर्वोपरि हैं ख्याल रखने में कोई कोताही नही की थी। पर योगी ऐसा करने में विफल हैं। विकास के नाम पर वे केवल गौशाला और गौ अभयारण्य बनवाना जाते हैं जो आगे चलके भ्रष्टाचार का अडडा साबित होगें। क्योंकि इसमें बिहार के चारा घोटाले की तरह बेजुबानों के भूसे का पूरा बजट हड़प जाने का बड़ा स्कोप है। नरेंद्र मोदी को कभी यह गंवारा नही होता कोई उनके कद के समानांतर हो इसलिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व तो पहले से फिराक में था ही और योगी की गलतियों ने उसे और सुगमता से अर्श से फर्श पर पटकने का मौका दे दिया। कल तक योगी को उड़ान के लिए असीमित क्षितिज मिलता दिख रहा था लेकिन अब लोगों की निगाह में केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें सीमाओं से बांध दिया है।


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