नाकामियों से घबराये योगी, अब मीडिया की शरण में

By: jhansitimes.com
Aug 25 2017 11:19 am
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH ) व्यवस्था में सुधार लाने के मामले में सरकार हारी मानने पर हो तो कोई बात नहीं लेकिन लोगों को बरगलाये रखने के लिए यह इंतजाम तो किया ही जा सकता है कि मीडिया में सरकार की नाकामियों का प्रस्तुतिकरण कम से कम होने दिया जाए और ऐसे गैर जरूरी ज्वलंतशील मुद्दों को भड़काये रखने में मीडिया का सहारा लिया जाए, जिससे असली चर्चा नेपथ्य में चली जाए। कुछ ऐसे ही अंदाज में यूपी की योगी सरकार डैमेज कंट्रोल के लिए मैदान में उतरी है, जिसका खुलासा उसके बेवकूफ अधिकारियों ने सूचना विभाग के आदेश का मेल मीडिया कर्मियों की आईडी पर भेजकर कर दिया।

योगी सरकार में दूरदर्शिता ही नहीं तात्कालिक कसावट की भी बहुत कमी है। अब इस बात को वे लोग भी स्वीकार करने लगे हैं जिनका चुनाव में उत्साहपूर्ण योगदान इस सरकार के जन्म का कारण बना है। खुद सरकार को अपनी अक्षमता का अहसास हो चुका है। जिससे उसके हाथ-पैर फूले हुए हैं। लोगों ने भाजपा का ही एक रूप कल्याण सिंह के समय देखा। वे किसी मोर्चे पर विफलता हाथ में लगने पर अगर उसका खुलासा कर दिया जाए तो बौखलाते नहीं थे और नाकामी को लेकर ऐसी झूठी कहानियां बनाने की बजाय जिनका भेद लोगों के सामने स्वतः खुला हुआ हो, तस्वीर के उस रुख की ओर लोगों का ध्यान ले जाते थे जिसकी वजह से लोगों को नाकामी का कारण समझ में आता था और उन्हें भरोसा होता था कि सरकार इससे अवगत होते हुए ऐसे दूरगामी कदम उठा रही है। जिसके कारण तात्कालिक परेशानी के बाद स्थायी निदान की उम्मीद की जाना गलत नहीं है।

योगी से तो कल्याण सिंह से ज्यादा उम्मीद थी। वे योगी हैं। वीतराग संत हैं इसलिए उनसे उम्मीद थी कि अगर वे कहीं सफल नहीं हो पा रहे तो भी बिना लाग-लपेट के बात करेंगे। यह प्रमाणिकता किसी भरोसेमंद सरकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन योगी ने इस प्रमाणिकता को खो दिया है। सीएम योगी यह मान चुके हैं कि व्यवस्था में सुधार के लिए वांछनीय हस्तक्षेप करना उनके बूते की बात नहीं है। लेकिन इसके बावजूद वे अपनी क्षमताओं को लेकर लोगों में भ्रम बनाये रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने नये हथकंडे के रूप में मीडिया को मैनेज करने का फरमान नौकरशाही के लिए जारी कर दिया है।

चाहे गोरखपुर का मामला रहा हो या इसके पहले उनके दौरों में मीडिया को टेकिल करने में बड़ी चूक हुई। धर्माचार्य होने के अहंकार के चलते योगी मीडिया को भी तुच्छ मानने की भूल कर बैठे थे। इसलिए उन्होंने प्रदेश की राजधानी की मीडिया को शुरू में स्पेशल ट्रीटमेंट जैसी व्यवस्था की आवश्यकता को नजरंदाज किया। नतीजा यह हुआ है कि जहां वे गये वहां मंडल, जनपद के अधिकारी स्थानीय मीडिया कर्मियों से घुले-मिले थे सो उऩको तो उन्होंने भाव दिया लेकिन लखनऊ के पत्रकारों की जबर्दस्त उपेक्षा हुई। वे कहीं भी योगी के कार्यक्रम को ढंग से कवर नहीं कर पाये। इसके कारण योगी के कार्यक्रमों का कवरेज मीडिया में आलोचनात्मक दृष्टिकोण से हुआ और यह क्रम बढ़ता ही गया। इससे योगी सरकार का नकारात्मक इंप्रैशन जनमानस में गहराता गया। गोरखपुर में बच्चों की मौत के मामले में यह इंपैक्ट योगी सरकार को ज्यादा भयावह रूप में भुगतना पड़ा। जिसके बाद उनको केंद्र से भी हिदायत मिली और अपने स्तर से भी योगी सरकार डैमेज कंट्रोल के लिए जागरूकता दिखाने को तत्पर हुई।

इसी का नतीजा रहा सूचना निदेशालय के माध्यम से सभी जिलों के लिए जारी कराया गया वह आदेश जिसमें जिलाधिकारियों से कहा गया है कि वे लखनऊ की मीडिया के मान-सम्मान का पूरा ख्याल रखें। उन्हें कवरेज में योगी के निकट अधिकतम दूरी तक जाने की सहूलियत दी जाए। साथ ही कवरेज में उनका पूरा सहयोग किया जाए। जाहिर है कि योगी सरकार ने यह सोचा है कि मीडिया के देवताओं को अगर प्रसन्न रखेंगे तो उनका प्रदर्शन चाहे जितना निराशाजनक हो लेकिन मीडिया में अच्छी तस्वीर सामने लायी जाएगी तो लोग भी खबरों की आड़ में विज्ञापन के इस तौर-तरीके से वशीभूत होकर उनकी सरकार से अपनी उम्मीदों को नहीं हटा पाएंगे।

जहां तक  संभव है योगी को इस हथकंडे से कुछ न कुछ सार्थक परिणाम तो अवश्य हासिल होंगे, लेकिन उन लोगों के लिए राज्य सरकार की यह हरकत बेहद निकृष्ट मालूम पड़ने वाली है जो उम्मीद पाले थे कि लीक से अलग हटकर काम करने का साहस योगी सरकार दिखाएगी। जिससे मीडिया सहित समाज में हावी प्रभावशाली वर्ग भले ही नाराजगी महसूस करे तथापि जनता इस साहस को नवाजेगी, सराहेगी। अब योगी सरकार के उक्त फरमान का असर यह होगा कि पत्रकारिता की आड़ में अधिकारियों पर दबदबा बनाने का मंसूबा रखने वाले अराजक तत्वों की पौ-बारह हो जाएगी। जिनकी हरकतों से आम जनता का कोई भला नहीं होता बल्कि उसके अधिकारों का दमन ही होता है, जो उस व्यवस्था में सबसे ज्यादा बाधक है। योगी सरकार के फरमान से केवल लखनऊ के ही पत्रकारों को सेट करने का संदेश अधिकारियों को नहीं मिलेगा बल्कि इस फरमान ने अधिकारियों को यह मैसेज दिया है कि पत्रकार नाम के हर जंतु से डरो, भले ही उसका पत्रकारिता से कोई सरोकार न हो और वह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी सीमा तक व्यवस्था बिगाड़ने का काम कर रहा हो।

भाजपा और योगी सरकार यह नहीं समझ पा रही कि लोग सरकार से चाहते क्या हैं। पूरी दुनिया में भाजपा की सरकार के सत्ता में आने के पहले ही लोग यह चर्चा कर चुके हैं कि भारत में व्यवस्था बिगाड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारक यह है कि यहां कुछ ज्यादा ही स्वतंत्रता और लोकतंत्र है। इतना ज्यादा कि इसने लोकतंत्र को जिसकी लाठी उसकी भैंस के राज का उपकरण बना दिया है। आम जनता के हित और सुविधाएं इस व्यवस्था में लगातार हाशिये पर खिसकते जा रहे हैं और पत्रकार, नेता, वकील, डॉक्टर इत्यादि वर्गों के गिरोह सारे कानून और अनुशासन से ऊपर होते जा रहे हैं। एक अच्छी सरकार को अपने से यानी कानून से ऊपर किसी को न होने देने के लिए समाज में शक्तिशाली वर्ग सत्ता स्थापित करने वाले निहित स्वार्थों से जूझना चाहिए। उन्हें औकात में लाने का साहस दिखाना चाहिए।

इंदिरा गांधी के समय यह काम हुआ। राजाओं के  प्रिविपर्स और विशेषाधिकार को खत्म करना छोटे-मोटे साहस का काम नहीं था। आखिर इन राजाओं का देश के मान-सम्मान में क्या योगदान था। उन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए। इसके बावजूद अपने लोगों की भलाई की सोचने की बजाय  राज्य की जनता से मिलने वाले लगान को विद्रूप अय्याशियों पर खर्च करना इनका शगल था,जिसका विवरण दीवान जर्मनीदास की महाराजा और महारानी किताबें पढ़ने से आज भी हो जाता है। लेकिन फिर भी ऐसा सोचने वाली सरकार अगर बड़े आदमियों से उलझेंगे तो उनका नुकसान हो जाएगा। राजाओं से लड़ नहीं सकते क्योंकि नवजात आजादी में राजभक्ति के कीटाणु मौजूद बने हुए थे। राजा का रुतबा किए जाने से प्रजा की राजभक्ति आहत होने पर चुनाव में नुकसान की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता था।

लेकिन जब इंदिरा गांधी ने उनके खिलाफ कदम उठाया तो उस समय की अशिक्षित जनता भी अपने सिक्ससेंस से जान गई कि सरकार ने कितना जरूरी काम किया है। इसके पहले बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामले में भी यही हुआ था। बैंकिंग सिस्टम मायने बड़े पूंजीपतियों, उद्योगपतियों को काम-धंधे के लिए सुविधापूर्ण कर्ज उपलब्ध कराना माना जाता था। आम जनता के आर्थिक विकास से बैंकिंग सिस्टम का कोई लेना-देना नहीं माना जा रहा था। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से इंदिरा गांधी ने यह संदेश दिया कि सरकार नाम की संस्था को सबसे पहले लोगों के आर्थिक विकास की चिंता करना है न कि केवल मुट्ठी भर लोगों के फायदे की। इंदिरा गांधी के इस कदम से राजनीतिक सत्ता के समानांतर बल्कि कहीं-कहीं उससे भी ज्यादा शक्तिशाली आर्थिक सत्ता के खार खा जाने की पूरी संभावना थी और ऐसा हुआ भी। पर इंदिरा गांधी अपने निश्चय से डिगी नहीं और उन्होंने अर्थ जगत के सूरमाओं की नाक में नकेल डालकर नये बैंकिंग सिस्टम को लागू करा दिया।

कहीं न कहीं इसी तरह के बदलाव की इच्छा की परिणति इमरजेंसी के रूप में हुई। मौजूदा सरकार ने इमरजेंसी की बरसी मनाने की मूर्खतापूर्ण प्रथा शुरू की है, जो उसी के हाथ बांधने का काम कर रही है। दरअसल इस समय व्यवस्था का पूरा अनुशासन तार-तार हो चुका है। इसलिए लोकतंत्र में लोक की कोई वकत नहीं रह गई। संविधान में कहने को तो सभी के लिए मौलिक अधिकार हैं लेकिन बड़ा आदमी इस अधिकार के दुरुपयोग के लिए भी सुप्रीम कोर्ट की मदद लाखों में वकील खरीदने की क्षमता रखने की वजह से ले सकता है, जबकि आम आदमी जिसके लिए सरकार के कोप को झेलना तो बहुत दूर की बात है, वह तो लेखपाल और सिपाही तक की नाराजगी को झेलने की स्थिति में नहीं होता क्योंकि उसके मौलिक अधिकार की चाहे जितनी ऐसी-तैसी कर दी जाए पर उसकी क्या औकात जो वह हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सके। न उसके पास लाखों की फीस होगी और न राधा नाचेगी।

इसलिए विनोबा भावे ने इमरजेंसी अनुशासन परिधि की संज्ञा दी थी और अगर व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सीमित अवधि के इमरजेंसी जैसे कदम को उठाने की जरूरत पड़ती है तो सरकार को उससे भी पीछे नहीं हटना चाहिए। जब तक भाजपा सत्ता में नहीं आयी थी तब तक उसका रोना रहता था कि कम्युनिस्ट वाले यूनियनवाद को बढ़ावा देकर सुव्यवस्था में सेंध लगा रहे हैं इसलिए वह सत्ता में आएगी तो यूनियन,हड़तालें ये सब चीजें कुछ दिन के लिए खत्म कर दी जाएंगी। लेकिन क्या ऐसा हुआ। भाजपा की सरकारें तो यूनियन और हड़तालों से मनमोहन सरकार से कहीं ज्यादा डरती हैं। बैंक वालों ने कमीशन लेकर सारा काला धन बदलवा दिया। सरकार को पता चल गया लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पायी क्योंकि बैंक वालों की यूनियन के सामने उसकी हिम्मत पस्त हो गई।

एक समय था जब सरकारी कर्मचारियों का वेतन बहुत कम था। इसके बावजूद सरकारी कर्मचारी गरीब लोगों का काम बिना किसी शोषण के करने को तैयार रहते थे, इसलिए लोगों की उनके साथ सहानुभूति रहती थी। उनकी यूनियनबाजी और हड़ताल से लोग हमदर्दी रखते थे लेकिन आज कर्मचारियों को भरपूर वेतन मिल रहा है। फिर भी वे काम नहीं करना चाहते और काम करते भी हैं तो तब जब फरियादी का शोषण करके उसे मिमियाने को मजबूर कर दें लेकिन हड़तालबाजी खत्म कराने का सरकार का साहस अब कहीं नजर नहीं आ रहा।

योगी ने कहा था कि सारे दफ्तर 9 बजे खुलें। अधिकारी और कर्मचारी ऐंठ गये। योगी को अहसास हुआ तो उनकी सरकार ने दुम दबा ली। अब 9 बजे दफ्तर खुलने का आदेश केवल कागजों में है। उस पर भी तुर्रा यह है कि योगी ने अधिकारियों की पोस्टिंग में जातिवादी दृष्टिकोण को सर्वोपरि रखा है। उन जातियों  को महत्वपूर्ण पद दिए गए हैं जिन्होंने वर्ण व्यवस्था की वजह से बहुसंख्यक लोगों को हमेशा कीड़े-मकोड़े की तरह समझा और उनकी तकलीफों पर ध्यान देने की कभी जरूरत नहीं समझी। यह मानसिकता आज भी उनके डीएनए में है। मायावती की सरकार थी तब शासन के अधिकारी जिलों में जांच करने पहुंचते थे तो जिले वाले कांप जाते थे क्योंकि सीनियर से सीनियर अधिकारी एक-एक चीज पैदल चलकर गंभीरता से देखता था। पर अब तो जैसा कांग्रेस के जमाने में होता रहा था वैसे ही अधिकारी शाही अंदाज में निरीक्षण का टोटका करते हैं। आम लोगों की शिकायतों के प्रति संवेदनशीलता की कोई भावना निरीक्षण के उनके परिणाम में नहीं झलकती। इसीलिए योगी को पता नहीं चलता कि प्राइवेट प्रेक्टिस न करने के उनके आदेश को डॉक्टर भटे के भाव भी नहीं पूछ रहे। उनके अधिकारी भी जिलों में जाते हैं तो उनको डॉक्टरों की मनमानी का पता नहीं चलता। इसके बाद जब गोरखपुर जैसा नरसंहार हो जाता है तब सरकार चौंकती है इसलिए मीडिया को सेट करके बिना कुछ किए अपनी हवा बनाए रखने के फेर में योगी सरकार न पड़े नहीं तो इतिहास उसे माफ नहीं करेगा।


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