योगी के ग्राफ में और गिरावट का इंतजार, बीजेपी नेतृत्व लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में कर सकता है फेर

By: jhansitimes.com
Jun 02 2017 09:18 am
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19 मार्च को मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने शपथ ग्रहण की थी। उसके भी पहले जब उऩका नाम सांसद होते हुए भी विधायक दल में प्रचंड बहुमत हासिल कर यूपी की सत्ता के द्वार पर पहुंची भाजपा की सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर फाइनल किया गया था तभी से मीडिया में उनकी वंदना का दौर शुरू हो गया था। एक महीने से ज्यादा समय तक सीएम योगी के नाम का मधुर वसंत मीडिया में इस कदर छाया रहा कि उन्हें मोदी के विकल्प और भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने में भी लोग पीछे नहीं रहे। इसके चलते यह खबरें आने लगी थीं कि पीएम मोदी टीआरपी की दौड़ में योगी से पिछड़ने के कारण परेशान हैं। पता नहीं यह सिर्फ गॉसिप का मुद्दा था या इसमें कुछ वास्तविकता भी थी लेकिन उस समय घटनाक्रम का परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में आंकलन किया जाए तो कहीं न कहीं यह बात विश्वसनीय लगती थी। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अब जरूर राहत महसूस हो रही होगी क्योंकि पिछले कुछ सप्ताह से योगी की लोकप्रियता का ग्राफ भीषण गिरावट के दौर में देखा जा रहा है। वे न सामाजिक संतुलन साध पा रहे हैं और न ही प्रशासनिक क्षमता का परिचय दे पा रहे हैं।

सहारनपुर दंगे के बाद में भाजपा द्वारा किए गए ध्रुवीकरण में जिस तरह से छेद हुए हैं उससे पार्टी के लिए दूरगामी तौर पर गंभीर नुकसान महसूस किया जाने लगा है। इसके बावजूद अगर केंद्रीय नेतृत्व यूपी के मामले में कोई दखल नहीं दे रहा तो क्या इसकी वजह यह नहीं है कि ऊपर से सीएम योगी के प्रति जनमानस में गहरी और उपचार के अयोग्य वितृष्णा पैदा होने की प्रतीक्षा केंद्रीय नेतृत्व कर रहा है। जो लोग उत्तर प्रदेश की स्थितियों को इस रूप में देख रहे हैं उनका आंकलन यह है कि लोकसभा चुनाव के दो-तीन महीने पहले भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश को लेकर कोई अलग निर्णय ले सकता है। मीडिया में भाजपा का रंग चढ़ने के बाद समाचारों के विश्लेषण का रिवाज खत्म सा हो गया है लेकिन योगी सरकार का भविष्य क्या होगा, इस पर चर्चाएं मीडिया में जैसी स्थितियां बन चुकी हैं, सामने लाई जाना वक्त का तकाजा है।

सीएम योगी की आर्थिक मामलों में ईमानदारी और सादगी पर अभी भी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है, लेकिन एक सफल मुख्यमंत्री के लिए अपेक्षाओं का आसमान इससे कहीं बहुत ज्यादा बड़ा है। उन्होंने अपनी पारी की शुरुआत करते हुए विभिन्न मोर्चों पर जो दृढ़ घोषणाएं की थीं उससे लगा था कि अब कुछ होने वाला है पर ऐसा क्यों हो गया कि लोग यहां तक कि भाजपा के कार्यकर्ता भी उनकी सरकार के रवैये से ऊब महसूस करने लगे हैं और उनमें नाउम्मीदी भरती जा रही है। योगी ने भ्रष्टाचार की गंगोत्री को रोकने के लिए अपने मंत्रियों व प्रदेश शासन के अधिकारियों से अपना आय और परिसंपत्तियों का ब्यौरा उपलब्ध कराने को कहा था। अगर वे यह ब्यौरा हासिल करने में कामयाब होते तो काफी हद तक राजनैतिक और प्रशासनिक वातावरण को स्वच्छ बनाने की सार्थक शुरुआत हो सकती थी। योगी के जो तेवर थे उसके मद्देनजर लोग पूरी तरह आश्वस्त भी थे कि वे अपने आदेश का अनुपालन कराने में मायावती से भी कहीं अधिक सक्षम सिद्ध होंगे। लेकिन इस मामले में जो हुआ उसे एक नजीर के बतौर देखा जा सकता है। उनके ज्यादातर मंत्रियों और शासन के अधिकारियों ने मांगा गया ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया है और योगी उन पर दबाव बनाने की बजाय अब इस मामले में चुप्पी साधे रहने को मजबूर हो रहे हैं।

पेट्रोल पंपों की घटतौली के मामले में हाईकोर्ट ने जिस तरह से उनकी सरकार को फटकार लगाई है उससे उनके इकबाल को गंभीर झटका लगा है। भाजपा की एक खास प्रतिबद्धता में यह भी शामिल था कि प्रदेश में सरकार बनने के बाद सपा शासन में जमीनों पर जो अवैध कब्जे हुए हैं वे खाली करा लिए जाएंगे और भू-माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन इसमें मंडल से जिले स्तर तक टास्क फोर्स के गठन के अलावा कोई प्रगति होती नजर नहीं आ रही है। जनसमस्याओं के निस्तारण के मामले में भी योगी सरकार का रवैया बहुत निराश करने वाला है। यहां तक कि मुख्यमंत्री के दरबार में और उनके पोर्टल पर दी गई शिकायतों में अधिकारी गंभीरतापूर्वक जांच कराने तक की जहमत नहीं उठा रहे हैं।

वातावरण ऐसा बन चुका है कि लोग उन्हीं अधिकारियों के रहमोकरम पर आश्रित हो गये हैं जिनकी मानसिकता आम लोगों के शोषण और उनके अस्तित्व को नकारे रखने की है। भ्रष्टाचार पहले से कई गुना बढ़ गया है। थानों की बिक्री ईमानदार डीजीपी के होते हुए भी बदस्तूर जारी है। पुलिस को दिशा देने वाली कोई कार्ययोजना न डीजीपी दे पा रहे हैं न मुख्यमंत्री। सही बात यह है कि मौजूदा डीजीपी से ज्यादा प्रभावी छाप तो सपा सरकार द्वारा नियुक्त निवर्तमान डीजीपी जावीद अहमद की थी जिन्होंने सरकार बदलने के बाद सभी क्षेत्रों के माफियाओं को चिन्हित करवाकर उन पर कार्रवाई का हिसाब दैनंदिनी तौर पर मांगना शुरू कर दिया था। मौजूदा डीजीपी पुलिस की हनक बनाने और अपराधियों में खौफ पैदा करने के लिए ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे। योगी के बारे में यह माना जाता है और सही भी है कि वे सुविधाभोगी नहीं हैं। लेकिन जिस तरह से अपनी सरकार के सम्मुख चुनौतियों के मामले में अब उन्होंने उदासीनता दिखाना शुरू कर दी है उससे वे किसी आरामतलब मुख्यमंत्री से भी ज्यादा ढीले साबित होने लगे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके समय सामाजिक सद्भाव का ताना-बाना टूटने लगा है और वे इसे संभालने के इच्छुक भी नहीं दिख रहे। मोदी की तरह उनमें यह क्षमता भी नहीं है कि नये शिगूफों और नई घोषणाओं से लोगों का ध्यान डायवर्ट करके उनके जोश और उमंग को बरकरार रख सकें।

उन्होंने अखिलेश सरकार के समय शुरू हुई योजनाओं का नाम बदलने और विकास कार्यों में भ्रष्टाचार की जांच के ताबड़तोड़ आदेश शुरू में जारी किए थे। लेकिन वे स्वयं न तो लोक-लुभावन घोषणाएं कर पा रहे हैं और न ही उनसे यह उम्मीद मौजूदा समय को देखते हुए बनी रह पा रही है कि वे गत सरकार के कार्यों की जांच को किसी अंजाम तक पहुंचा पाएंगे। यह तब हो रहा है जब मुख्यमंत्री दोनों उप मुख्यमंत्रियों और कुछ मंत्रियों को कुछ ही समय के अंदर राज्य विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता प्राप्त करना लाजिमी है और इसके चलते जल्द ही प्रदेश में उप चुनावों के ट्रायल का सामना राज्य सरकार को करना पड़ सकता है।

मिशन 2019 के लिए भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर अपने को सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में केंद्रित करना होगा। ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश की इस दशा को भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व संज्ञान में नहीं ले रहा तो निश्चित रूप से इसके पीछे कोई रणनीति है क्योंकि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चुनावी बाजी को अपने पक्ष में मोड़ने की कला में बहुत ज्यादा पारंगत है और इसमें उससे कोई चूक हो सकती है, इसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती। जाहिर है कि इसके कारण अगर यह अटकलें चल रही हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व योगी को अपने तरीके से काम करने की छूट देकर उनके स्थायी बंदोबस्त का ताना-बाना बुन रहा है तो चर्चाओं के इस धुएं के पीछे कहीं न कहीं तो कोई आग है। 

 (प्रधान संपादक, K.पी सिंह )


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