छवि सुधारने के लिए योगी की नई पहल

By: jhansitimes.com
Jun 16 2018 10:26 pm
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(EDITOR-IN-CHIEF, K.P SINGH)  योगी सरकार को एक वर्ष पूरा हो चुका है, इसके बावजूद अभी इसे नई नवेली ही कहा जायेगा। इसलिए अभी से लोगों का इससे ऊबना बहुत विडंबना पूर्ण लगता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ इतनी जल्दी अपनी सरकार की उल्टी गिनती शुरू होते देख परेशान हैं। जब वे सत्ता में नही थे तब एक बड़ा वर्ग उन्हें महानायक के रूप में देखता था लेकिन अब जैसे हर वर्ग में उनके लिए गर्मजोशी चुक चुकी है। लोगों की अपने प्रति पुरानी जैसी चाहत को जागृत करना योगी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जिसके लिए वे नई-नई पहल करने को तत्पर हैं। इसी के तहत गत दिनों उन्होंने प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जानेमाने लोगों से उनके दरवाजे पर पहुंचकर कुशलक्षेम पूंछी। इसे दूरगामी तौर पर एक अच्छा प्रयास कहा जाना चाहिए। उम्मीद है कि योगी को इसका राजनैतिक लाभ भी मिलेगा।

भारतीय समाज में संवैधानिक विवेक शून्यता का दोष जैसे नैसर्गिक है। यह अराजक अर्थों में मुक्त समाज है। जहां खूब मनमानी चलती है। मूल रूप से यहां आज भी धर्म आधारित व्यवस्थाएं प्रभावी हैं। लेकिन धर्म को लेकर कोई प्रतिबंधकारी व्यवस्थाएं इस समाज में देखने को नही मिलती। इंतहा यह है कि यहां कोई भी अपने को भगवान घोषित कर लेता है और मान्य हो जाता है। एक फिल्म रातों-रात संतोषी माता के नाम से नई देवी का अवतार करा देती है। वैसे तो जगत गुरू लिखने का अधिकार केवल शंकराचार्य की पीठ पर बैठे संत को है। लेकिन यहां गली-गली में जगत गुरू विचरण करते हैं और कोई कुछ नही कहता, महामंडलेश्वर की तो बात ही नही है। चूंकि मूल रूप से इस समाज का नियमन धर्म से होता है इसलिए राजनीति, प्रशासन और हर क्षेत्र में यह ढर्रा व्याप्त दिखाई देता है।

इस जमीन पर लोकतंत्र ने कुरीतियों की आग में घी डालने का काम किया है। इसके कारण उन उचक्कों की बन आई है जो अपने बाप को भी धक्का देकर आगे पहुंच जाने की हद तक बेहया हो। तपाक से उसका वरण भी कर लिया जाता है। उच्छृखंल स्वभाव की महत्ता को हाल के दशकों में राजनीति में विशेष गुण की तरह स्वीकार किया गया। जिससे अपराध करके पैसा कमाने वाले और समाज में आतंकी प्रभुत्व कायम करने वाले माननीय बन गये। हर पार्टी जीतने की योग्यता मानकर ऐसे ही लोगों की टिकट देने लगी। शील-संकोच में कैद रहने वाले शरीफ इसके कारण समाज के केंद्र से छिटकते चले गये।

भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह स्थिति बदलने की उम्मीद थी हालांकि भाजपा ने भी चुनाव में जीतने की क्षमता को आधार बनाकर ऐसे तत्वों को अपनाने में कसर नही छोड़ी थी लेकिन चूंकि भाजपा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से निर्देशित होती है जिसमें अपनी परंपरा के कारण अभी भी काफी हद तक सुशील समझे जाने वाले लोगों का बोलवाला है। सत्ता में आने के बाद संघ की समन्वय बैठकों में भाजपा के माननीयों के उद्दंड और गलत सोहबत के मुददे भी उठे लेकिन संघ उनमें बदलाव के लिए कोई दबाव नही बना सका। आज भाजपा के विधायकों को सिर्फ उन्हीं से मिलना-जुलना रास आता है जो उन्हें कमाई करा सकें। यहां तक कि कल तक दूसरी पार्टी की सत्ता में जो लोग लाभान्वित थे भाजपा में भी वे ही वरीयता प्राप्त कर रहे हैं। माननीयों की पसंद के कारण कानून व्यवस्था कराह रही है। सही मामले में सभ्रांत लोग इस चलन में अनुत्पादक मानकर उपेक्षित रखे जा रहे हैं।

ऐसे रेगिस्तानी सामाजिक माहौल में योगी एक नई पहल लेकर आयें तो उसे साहसिक कहा जायेगा। उन्होंने ईद के एक दिन पहले अपने नये अभियान के तहत प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सबसे पहले मशहूर चिकित्सक और पदमश्री डा. मंसूर अहमद की चैखट पर दस्तक दी। इसके बाद वे सेवा निवृत्त न्यायाधीश एचएन तिलहरी के घर पहुंचे। फिर उन्होंने परमवीर चक्र विजेता शहीद मनोज पांडेय के माता-पिता और रिश्तेदारों से भेंट की। पदमश्री रंगकर्मी राज विसारिया से मिले। वे पूर्व कुलपति प्रो. भूमित्र देव से मिलने उनसे घर पहुंचे। प्रदेश की राजधानी के बंगला बाजार में उन्होंने लेफ्टीनेंट जनरल आरपी शाही से मुलाकात की। प्रो. भूमित्र देव तो उनकी इस पहल से इतने अभिभूत हुए कि बोल उठे कि 70 वर्षों में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने इतना विलक्षण और उपादेय प्रयास किया है।

योगी ने इसके पहले मास कनेक्ट के लिए स्वराज अभियान की घोषणा की थी जिसके तहत जगह-जगह चैपालें आयोजित की गईं। लेकिन यह अभियान फ्लाप रहा। सत्ता में बैठकर गर्वित भाजपा के छुटभैये नेताओं तक को मंच और कुर्सी चाहिए। जबकि उनके मन में कोई जनसेवा का ऐसा करने की ललक नही रहती जिससे लोगों में उनके प्रति दिली आदर जग सके। इसलिए उनके फोकस दिखाऊ नटखट से आम लोग चिढ़ महसूस करते हैं। चैपालों में इसके कारण केवल घिसे-पिटे चेहरे नजर आये आम जनता दूर रही। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सम्मान देना जानता है उसी को सम्मान मिलता है। लेकिन दूसरे दलों के राजनैतिक कार्यकर्ताओं की तरह भाजपा के कार्यकर्ता भी यह विश्वास रखते हैं कि तथाकथित शरीफ लोग वोट और दूसरी चीजों के मामले में किसी काम के नही हैं। उन्हें नही मालूम कि किसी भी क्षेत्र में जिन विभूतियों ने अपने को स्थापित किया है वे कुदरत की अनमोल देन हैं। उनके पास आने-जाने से जितना लाभ राजनीति में मिल सकता है उतना बूथ कैप्चरिंग की टोलियां चलाने वाले गुंडे-मवाली कभी नही दिला सकते। ऐसे लोगों के प्रति जनमानस में अव्यक्त आस्था होती है जिसके कारण जो पार्टी सभ्रांत लोगों की सदभावना अर्जित रखती हो उसके प्रति जनता का ध्रुवीकरण एक वैज्ञानिक सत्य है।

योगी ने इसे दिखाने के लिए एक साहसिक पहल की है तो उसका चरितार्थ रूप जब सामने आयेगा तो लोग इस हकीकत को स्वीकार करेगें। लेकिन योगी को इस पहल को केवल अपने तक सीमित न रखकर समूची पार्टी की रीति-नीति का अंग बनाना चाहिए। वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. महेंद्र पांडेय से मिलकर मंत्रियों, सांसदों और विधायकों सहित सभी स्तर पर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए अपने-अपने क्षेत्र के प्रमुख भले आदमियों की सूची तैयार करके हर महीने उनमें से कुछ लोगों के यहां हाजिरी बजाने का सिलसिला बनायें। इसमें यह भी निर्देश होना चाहिए कि जिस तरह योगी ने इस मामले में यह ख्याल नही किया कि वे जिससे मिलने जा रहे हैं उस विभूति के द्वारा उनकी पार्टी की विचारधारा का समर्थन किया जाता है कि नहीं। उसी तरह अन्य लोग भी सर्वमान्यों को आदर देने के लिए जाते हुए दलगत भावना से दूर रहें। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो राजनीतिक संस्कृति को बदलने में एक बड़ा हस्तक्षेप करेगा।


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