लालू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है

By: jhansitimes.com
Jan 25 2018 08:10 pm
144

राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले से जुड़े चाईबासा ट्रेजरी से 23 करोड़ 67 लाख रुपये की अवैध निकासी के तीसरे मामले में भी पांच साल की सजा सुना दी गई है। इसके पहले चारा घोटाले के ही दो और मामलों में भी उनको सजा दी गई थी। देवघर कोषागार घोटाला मामले में कुछ ही दिन पहले सजा सुनाये जाने के बाद से लालू प्रसाद यादव झारखंड की बिरसामुंडा केंद्रीय जेल में बंद हैं। इस बीच भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की दो जनहित याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई चल रही है। एक याचिका में दोष सिद्ध को पार्टी बनाने और किसी पार्टी में पदाधिकारी बनने के अधिकार से वंचित करने की मांग की जा रही है। दूसरी याचिका में पांच वर्ष या इससे अधिक की सजा वाले अपराध में आरोप तय होने के बाद संबंधित व्यक्ति पर पार्टी बनाने या किसी पार्टी द्वारा उसे अपना पदाधिकारी बनाने पर रोक की मांग है। इस तरह राजद के मुखिया के पद पर भी अब ग्रहण नजर आ रहा है। इसके अलावा दो वर्ष से अधिक के सजायाफता व्यक्ति पर 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने की रोक रहती है। इसे देखते हुए लालू का लंबे समय के लिए चुनावी दौड़ से बाहर हो जाना भी तय लग रहा है। जबकि लालू की उम्र वर्तमान में ही काफी हो चुकी है। इस तरह से एक समय देश के राजनैतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभरे लालू प्रसाद यादव जैसी शख्सियत के राजनैतिक कैरियर के दुखांत के स्पष्ट आसार बन गये हैं। सार्वजनिक जीवन में संभलकर काम न करने वाले नेताओं को लालू के हश्र से सबक सीखना पड़ेगा। राजनेताओं के निरंकुश आचरण में इसकी देखादेखी बदलाव आना चाहिए पर ऐसा होगा इसमें पर्याप्त संदेह है।

लालू प्रसाद यादव अकेले बड़े राजनेता नही हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में जेल का मुंह देखना पड़ा है। इनेलो के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चोटाला भी इसी वजह से जेल काट रहे हैं। बिडंबना यह है कि भ्रष्टाचार और सत्ता के मनमाने दुरुपयोग के सूरज की रोशनी की तरह साफ मामले वाले शीर्ष नेताओं की संख्या दर्जनों मे है जबकि सजा केवल दो नेताओं को हुई है। ऐसे में क्या ये दो नेता अपवाद मात्र बनकर रह गये हैं। जबकि समाज में आम धारणा यह बनी हुई है कि एक स्तर पर पहुंच चुके राजनेता का न तो जांच एजेंसियां कुछ उखाड़ पाती हैं और न ही न्यायपालिका। तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता का दृष्टांत इस धारणा को और पुख्ता करता है। जयललिता पर जब आय से अधिक संपत्ति के मामले में छापेमारी हुई थी तब उनके घर मिले वैभव के अंबार को मीडिया में जिस तरह प्रचारित कराया गया था उसके मददेनजर लोगों ने यह कसौटी बना ली थी कि हिन्दुस्तान में न्याय होता है या नही अब यह दिखेगा। इतनी बरामदगी के बावजूद अगर जयललिता को सजा न हो पाई तो कैसे कहा जायेगा कि हिन्दुस्तान में न्याय व्यवस्था कारगर है। न्यायपालिका को भी इनज न भावनाओं का एहसास रहा। इसलिए जयललिता पहले दंडित हुई और जेल भिजवाई गईं। मुख्यमंत्री पद के लिए हो चुकी उनकी शपथ को न्यायपालिका ने रदद करवाया। लेकिन आखिर में जयललिता को अंत भला तो सब भला का सिला मिला। वे अपने अंतिम समय में सकुशल बरी हुईं और यशस्वी जीवन को प्राप्त करके उन्होंने महाप्रयाण किया। इस पर लोगों ने अपने को छले जाने जैसा महसूस किया। आखिर उन सबूतों का क्या हुआ जयललिता के घर में हुई बरामदगी के रूप में चींख-चींख कर उनके द्वारा आमदनी से बहुत ज्यादा संपत्ति बटोरने की गवाही दे रहे थे।

उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं के इस तरह के मामले का भी यही हश्र हुआ। मुलायम सिंह और मायावती के मामले में आय से अधिक संपत्ति व भ्रष्टाचार के मामले कई बार सामने आये। यहां तक कि अदालत में भी पहुंचाये गये लेकिन तकनीकी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी उन्हें राहत देने की जरूरत महसूस की। मुलायम सिंह तो एक बार भावावेश में खुले मंच से कह चुके हैं कि उच्चतम न्यायालय में अमर सिंह ने उनके लिए मामला मैनेज किया था वरना वे और अखिलेश दोनों जेल में होते। आश्चर्य यह है कि इसे संज्ञान में लेकर उच्चतम न्यायालय ने उन पर कोई कार्रवाई करने की जहमत नही उठाई। बात का बतंगड़ न बनाने की समझदारी दिखाने की चेष्टा इस तरह उच्चतम न्यायालय ने भले ही की हो लेकिन इसका संदेश बहुत गलत रहा। लोगों ने माना कि दाल में काला जैसा जरूर कुछ था। जिसकी वजह से मुलायम सिंह की आक्षेपात्मक स्वीकारोक्ति को उच्चतम न्यायालय को नजरअंदाज करने में ही गनीमत दिखी। मुलायम सिंह और मायावती की खुद की बात नही है उनके कारिंदे तक चप्पल चटकाते-चटकाते उनके पारस स्पर्श से अरबपति-खरबपति बन गये उनका भी क्या कुछ बिगड़ गया। मायावती के कोर्डिनेटरों की कुछ वर्ष पहले की स्थिति देखिये और वर्तमान में उनकी चमकार देखें। कौन सा ऐसा मुनाफे का धंधा उनके हाथ लगा या कारू का खजाना मिल गया। जिससे उनकी रातों-रात कायापलट जैसी हालत हो गई। वरना असल कारोबारियों से पूंछिये उन्हें तो कभी-कभी पूंजी तक बचाने के लाले पड़ जाते हैं जबकि मुनाफा कमाने के उनके हुनर का जोड़ इसलिए नही हो सकता क्योंकि वे पुस्तैनी कारोबारी होते हैं। अगर पूर्णकालिक राजनीतिक रहने के बावजूद शार्टटाइम धंधे में इतनी कमाई करने की कला इन्हें आती है तो वास्तव में मानना पड़ेगा कि कारोबार के लिए सुगमता वाले देशों में भारत का कोई सानी नही है। मुलायम सिंह के लोग तो और भी चार कदम आगे हैं। उनकी सरकार रही तो उनके कार्यकर्ताओं ने भाजपाइयों के साथ कोई मुरौव्वत नही दिखाई। जब तक अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार नही बनी थी तब तक मुगालता यह था कि केंद्र में सरकार में आने का मौका भाजपा को कभी नही मिलेगा। इसलिए मुलायम सिंह के पहले दो कार्यकाल में भाजपाइयों का धर्म, धन सब लूटा गया। केवल छुटभइयों का ही दमन नही हुआ। केसरीनाथ त्रिपाठी और तमाम दिग्गज भाजपाइयों को भी मार-मार कर सुजा दिया गया। हाल ही में निवर्तमान हुई सरकार के समय सपा के भू माफियाओं ने हर जगह प्राइम लोकेशन पर कब्जा किया। अगर राजनीति में शुचिता की बहाली और भ्रष्टाचार की समाप्ति का इस निजाम का उददेश्य होता तो लालू प्रसाद यादव की तरह न जाने कितने सपाई उत्तर प्रदेश में जेल में सड़ते दिखाई देते। पर लगता है कि सपा के मामले में भाजपा वाले बिल्कुल साधु हैं। अपनी चोटें तक वे लोग भूल गये और केंद्र व प्रदेश में सरकार बनने के बाद जियो और जीने दो के सिद्धांत के तहत खुद कमा रहे हैं और सपाइयों को भी बदस्तूर कमाने दे रहे हैं।

दरअसल राजनीतिक बिरादरी का रूप ले चुकी है। आमतौर पर कोई सरकार बिरादरी भाई को तकलीफ नही पहुंचाना चाहती। राजनेताओं के भ्रष्टाचार के अर्जन को हर सरकार उसके अधिकार जैसी अघोषित मान्यता देती है। जब यह हो रहा है तो लालू की जांच इतने पैनेपन से कैसे हो गई कि उन्हें हर मुकदमे में जेल हो रही है। पहले तो मुलायम सिंह और लालू में अंतर समझ लें। राजग के सत्ता में आने का द्वारा खुलने के बाद मुलायम सिंह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए जार्ज फर्नांडीज से कुजात समाजवादियों के माध्यम से भाजपा से अंदरूनी तार जोड़ने का कुफ्र करने में संकोच नही किया। जबकि लालू ने राजनैतिक ईमान के साथ समझौता करने की कभी चेष्टा नही की। जिसके कारण जब भी उनकी चली वर्ग शत्रुओं की तरह भाजपाइयों पर उनका कहर टूटा। इसके साथ बड़ी बात यह रही कि लालू ने मुलायम सिंह और मायावती की तरह सामाजिक यथास्थितिवाद के आगे कभी समर्पण नही किया। इसका कितना महत्व है इसी बात से समझा जा सकता है कि मोरारजी सरकार में ओमप्रकाश चोटाला घड़ियों की तस्करी में पकड़े गये थे। इसलिए उनके प्रति मीडिया में विषवमन होता था। लेकिन सामाजिक न्याय की ओर कदम बढ़ाने के बाद जब वीपी सिंह सबसे बड़े खलनायक हो गये तो चोटाला के साथ मीडिया को जबर्दस्त हमदर्दी हो गई। जब तक वीपी सिंह को नुकसान पहुंचाना था तब तक चोटाला का बचाव होता रहा। आखिर में जब इसकी प्रासंगिकता खत्म हो गई तभी उनके जेल जाने की नौबत आई। क्योंकि वे तो शुरू से ही ऐसी करनी के आदी थे कि उनको जेल जाना पड़ता। इसलिए लालू को छोड़कर सामाजिक वर्ग प्रभु इस देश में किसी भी भ्रष्ट नेता के लिए बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है जैसा गाना नही गा सकते। बिहार की गरीब जनता भी उस असलियत को समझती है जिसके कारण लालू को दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं। इसलिए लालू व्यक्तिगत रूप से भले ही राजनैतिक पवेलियन में बैठने को मजबूर हो जायें लेकिन बिहार की राजनीति में उनकी नियामक भूमिका शायद ही घट पाये। अनुमान यह है कि अगले चुनाव में वे अपने गृह राज्य में अपने पुत्रों के माध्यम से और ज्यादा हावी होकर उभरेगें।


comments

Create Account



Log In Your Account



छोटी सी बात “झाँसी टाइम्स ” के बारे में!

झाँसी टाइम्स हिंदी में कार्यरत एक विश्व स्तरीय न्यूज़ पोर्टल है। इसे पढ़ने के लिए आप http://www.jhansitimes .com पर लॉग इन कर सकते हैं। यह पोर्टल दिसम्बर 2014 से वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की नगरी झाँसी (उत्तर प्रदेश )आरंभ किया गया है । हम अपने पाठकों के सहयोग और प्रेम के बलबूते “ख़बर हर कीमत पर पूरी सच्चाई और निडरता के साथ” यही हमारी नीति, ध्येय और उद्देश्य है। अपने सहयोगियों की मदद से जनहित के अनेक साहसिक खुलासे ‘झाँसी टाइम्स ’ करेगा । बिना किसी भेदभाव और दुराग्रह से मुक्त होकर पोर्टल ने पाठकों में अपनी एक अलग विश्वसनीयता कायम की है।

झाँसी टाइम्स में ख़बर का अर्थ किसी तरह की सनसनी फैलाना नहीं है। हम ख़बर को ‘गति’ से पाठकों तक पहुंचाना तो चाहते हैं पर केवल ‘कवरेज’ तक सीमित नहीं रहना चाहते। यही कारण है कि पाठकों को झाँसी टाइम्स की खबरों में पड़ताल के बाद सामने आया सत्य पढ़ने को मिलता है। हम जानते हैं कि ख़बर का सीधा असर व्यक्ति और समाज पर होता है। अतः हमारी ख़बर फिर चाहे वह स्थानीय महत्व की हो या राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय महत्व की, प्रामाणिकता और विश्लेषण के बाद ही ऑनलाइन प्रकाशित होती है।

अपनी विशेषताओं और विश्वसनीयताओं की वजह से ‘झाँसी टाइम्स ’ लोगों के बीच एक अलग पहचान बना चुका है। आप सबके सहयोग से आगे इसमें इसी तरह वृद्धि होती रहेगी, इसका पूरा विश्वास भी है। ‘झाँसी टाइम्स ‘ के पास समर्पित और अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ संवाददाताओं, समालोचकों एवं सलाहकारों का एक समूह उपलब्ध है। विनोद कुमार गौतम , झाँसी टाइम्स , के प्रबंध संपादक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। जो पूरी टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का पिछले लगभग 16 वर्षों का अनुभव है। के पी सिंह, झाँसी टाइम्स के प्रधान संपादक हैं।

विश्वास है कि वरिष्ठ सलाहकारों और युवा संवाददाताओं के सहयोग से ‘झाँसी टाइम्स ‘ जो एक हिंदी वायर न्यूज़ सर्विस है वेब मीडिया के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में कामयाब रहेगा।