यहां जिस्म, हवस, हेट स्टोरी जैसी फिल्म चल सकतीं हैं, जागरूक करने वाली आर्टिकल 15 नहीं

0
4

जब दलित पिता रोते हुए पुलिस ऑफिसर से बोलता है “साहब हमारी बेटी को उठाकर ले गए थे । रात भर रखकर सुबह वापस भेज देते न । मार क्यो डाला ?? “आर्टिकल 15” के इस डायलाग को सुनने के बाद थियेटर के अंधेरे में भी शर्म से सर झुक जाए । ग्रामीण इलाकों में दलितों की दुर्दशा से जो इंकार करता है उसका मतलब है उसने गाँव नही देखा है । फ़िल्म के एक दृश्य में जब दलित व्यक्ति गटर के काले पानी में नाक बंद कर डुबकी लगाता है पल भर को दर्शकों की आँखे बंद हो जाती है । यह दृश्य भीतर तक हिला देता है ।

ब्राह्मणों ने फ़िल्म के विरोध में कई जगह प्रदर्शन किया । मुझे नहीं लगता के फ़िल्म कही से भी ब्राह्मण विरोधी है । फ़िल्म में कही भी स्वर्णो को कोसा नही गया है । जाति विशेष को खलनायक बनाना फ़िल्म का मकसद नही है । असल में फ़िल्म अपने मूल मुद्दे से हटी ही नही । फ़िल्म का पूरा फोकस भारत के दूरस्थ गाँवों में दलितों की दुर्दशा , न्याय के लिए उनका संघर्ष और सिस्टम के भेदभाव पर है । फ़िल्म की कहानी जातिवाद , राजनीति और प्रशासनिक तंत्र पर रसूखदारों के कब्जे के चारों ओर घूमती है ।

यह फ़िल्म आज देश की सबसे बड़ी समस्या… “जातिगत भेदभाव और जाति की राजनीति ” पर जबरदस्त तरीके से चोट पहुँचाती है । दलित समुदाय से जो लोग राजनीति करते हुए आगे बढ़ भी गए है तो वे अपने फायदे के लिए दूसरे राजनैतिक दलों से गठबंधन कर दलित संघर्ष को तिलांजलि दे सत्ता भोग रहे है । अपनी-अपनी जाति , धर्म के अगुआ नेता पद और सत्ता की खातिर रैलियाँ निकालते है और गठबंधन करते है । पूरी फिल्म में ऐसे कई डायलाग है जो हमारे देश की जहरीली राजनीति का निचोड़ है ।

“ये साला पोजिशन वालों की अपनी ही एक जात है ।”

” समस्या के बारे में बात करने वाला व्यक्ति सबसे बड़ी समस्या है ।”

” हादसा ये नही है कि हादसा हो चुका है। उससे बड़ा हादसा तो ये है कि सब चुप है।”

देश की राजनीति और वोटर्स की मानसिकता को भी खुलकर , बेझिझक दिखाया गया है । फ़िल्म का नायक अपने सहकर्मियों से पूछता है किसे वोट दिए थे । अलग अलग जाति के पुलिसकर्मी के अलग अलग जवाब — फूल को दिए थे लेकिन वो साल जब हाथी से मिल गए तो सायकल को दिया था । फलाने को टिकट नही दिया तो हम वोट ही नही डाले । निराशा होती है सोचकर कि जब तक हमारे समाज में जातियाँ रहेंगी देश को निक्कमे और जहर बुझे नेता ही मिलेंगे । हम वोट देते समय मुद्दों का ध्यान नही बल्कि नेता की जाति का ध्यान रखते है । चालबाज़ लोग जाति और धर्म की राजनीति करके , समाज को बाँटकर ही सत्ता तक पहुँचते है ।

फ़िल्म की कहानी गौरव सोलंकी की लिखी हुई है और निर्देशक अनुभव सिन्हा है । हर दृश्य इतना वास्तविक कि दर्शक स्वयं को पुलिस थाने में महसूस करता है । देश की रग रग में बसे जातिवाद पर यह फ़िल्म गहरा प्रहार है । माना कि ऐसी फिल्में साल की सबसे बड़ी ओपनिंग नही करती लेकिन साल की सबसे अच्छी फिल्म की अग्रिम पंक्ति में खड़ी है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here