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जानिए, आखिर मकर संक्रांति पर भगवान सूर्य की क्यों होती उपासना

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(रिपोर्ट-गोविंद सिसोंदिया) झांसी/गुरसराय। भारतीय ज्योतिष में 12 राशियां मानी गई हैं। उनमें एक मकर राशि में सूर्य के प्रवेश करने को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मतलब यह है कि सूर्य के उत्तरायण होने को मकर संक्रांति कहते हैं। इसे हिंदुओं का बड़ा त्यौहार भी माना जाता है। यह पर्व शीत ऋतु के जाने तथा मनोहरी बसंत के आगमन का प्रतीक है। इसे भगवान सूर्य की उपासना और स्नान ध्यान का पर भी मनाते हैं। इसे पूरे देश में बड़ी श्रद्धा उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
कथा के अनुसार यशोदा ने इस दिन श्रीकृष्ण के जन्म के लिए व्रत रखा था। उसी दिन मकर संक्रांति के व्रत की परिपाटी चली आ रही है। पुराणों में वर्णित है कि सूर्य के मकर राशि में होने से मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति आत्मा मोक्ष को प्राप्त करती है अर्थात आत्मा को जन्म मरण के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। महाभारत काल में अर्जुन के बाणों से घायल भीष्म पितामह ने गंगा के तट पर सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का 26 दिनों का इंतजार किया था। इच्छा मृत्यु का वरदान मिलने के कारण वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए सूर्य के उत्तरायण होने तक जीवित रहे। श्री पदम पुराण में कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया दान अक्षय पुण्य देने वाला है और पाप नाशक है इसलिए तिल गुड़ के व्यंजन ऊनी वस्त्र कंबल काले तिल आदि दान करने की परंपरा है। मकर संक्रांति के हर 12 वर्ष प्रयाग उज्जैन हरिद्वार और नासिक कुंभ में मेला लगता है। जहां समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत की कुछ बूंदें गिरी थी। इस पर्व पर दक्षिण भारत में बालकों विद्याधन प्रारंभ कराया था। प्राचीन रूप में इस खजूर अजीत तथा शहद बांटने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। मकर संक्राति का पर्व पंजाब में लोहड़ी दक्षिण में पूगल मध्य प्रदेश व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संक्रात पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार में खड़ी के नाम से जाना जाता है।

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