गर्भवती महिलाओं को गर्भ के समय होती है यह बीमारी, मां और गर्भस्थ शिशु को हो जाता खतरा

झाँसी। बुन्देलखंड में झांसी जिले के बीएचईएल क्षेत्र में रहने वाली 25 वर्षीय अभिलाषा तीसरी बार माँ बनी है। उन्होने मेडिकल कॉलेज में अपने तीसरे बच्चे को जन्म दिया। अभी वह और उनका बच्चा पूरी तरह सुरक्षित है। डॉक्टर से पता चला कि अभिलाषा जेस्टेशनल डायबिटीज का शिकार है यही नही उनके तीनों बच्चों के प्रसव के समय वह जेस्टेशनल डायबिटीज का शिकार रही।
अभिलाषा बताती है कि जब वह पहली बार गर्भवती हुयी थी तब वह अपने मायके नोएडा में थी और गर्भवस्था के छ्ठ्वे माह में उन्हे इसके बारें में पता चला। शुरुआत में खान-पान और दवाइयों से स्थिति को संभाला, लेकिन अंततः मुझे खून में शुगर के स्तर को कम करने के लिए इंसुलिन लेना पड़ा। इसके बावजूद भी देरी से पता चलने के चलते उनके पहले बच्चे के दिल में बहुत हल्के हल्के से छेद थे, जो समय के साथ सही देख-रेख से सही हो गए। अभिलाषा के पति पेशे से व्यापारी है और एक जागरूक महिला होने के नाते उन्होने अपनी जांच समय समय पर करायी, जिस कारण उनके तीनों बच्चे आज के समय में पूरी तरह स्वस्थ्य है।
मेडिकल कॉलेज की सहायक प्रोफेससर डॉ॰ सुचेता बताती है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में कई तरह के बदलाव होते है, जिसमें एक खून में शुगर की मात्रा बढ़ना भी है, इस स्थिति को गर्भकालीन डायबिटीज यानि जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। हालांकि यह बीमारी महिलाओं में बच्चे के जन्म के बाद खत्म हो जाती है, और भविष्य में उन्हे डायबिटीज होने का खतरा रहता है। लेकिन इससे गर्भावस्था में कई तरह की परेशानियाँ हो सकती हैं। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की जान को भी खतरा हो सकता है।

क्यों बढ़ जाता है रक्त में शुगर
प्रसूति विभाग कि हेड डॉ॰ संजया शर्मा बताती है कि गर्भकालीन डायबिटीज के दौरान पेंक्रियाज ज्यादा इंसुलिन पैदा करने लगता है, लेकिन इंसुलिन ब्लड शुगर के स्तर को नीचे नहीं ला पाता है। हालांकि इंसुलिन प्लेसेंटा (गर्भनाल) से होकर नही गुजरता, जबकि ग्लूकोज व अन्य पोषक तत्व गुजर जाते हैं। ऐसे में गर्भ में पल रहे बच्चे का भी ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है। क्योंकि बच्चे को जरूरत से ज्यादा ऊर्जा मिलने लगती है, जो फैट के रूप में जमा हो जाता है। इससे बच्चे का वजन बढ्ने लगता है और समय से पहले ही बच्चे के जन्म का खतरा बढ़ जाता है। वह बताती है आज के समय में कुल गर्भवतियों में 10 से 17 प्रतिशत गर्भवती को जेस्टेशनल डायबिटीज होती है।

बच्चे पर होने वाले दुष्प्रभाव
गर्भ में पल रहे बच्चे को माँ से ही सभी जरूरी पोषण मिलता है। ऐसे में अगर माँ का शुगर बढ़ता है तो इसका असर अंदर पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। इससे गर्भ में पल रहा बच्चा कमजोर या ज्यादा वजन का हो सकता है, गर्भपात, या पेट में बच्चा खत्म हो सकता है, प्रसव के बाद कुछ समय के लिए सांस की तकलीफ हो सकती है, या दिल में छेद की संभावना हो सकती है, समय से पूर्व प्रसव हो सकता है, यदि बच्चे का प्रसव सही से हो गया तो उसके मोटापा बढ्ने और साथ ही उसे भी शुगर होने की संभावना बढ़ जाती है।

ऐसे बचे
गर्भावस्था में डायबिटीज से बचने के लिए सही तरह का खानपान, सक्रिय जीवन शैली, चिकित्सीय देखभाल, ब्लड शुगर स्तर की कड़ी निगरानी जरूरी है।

क्या कहते है जनपद के आंकड़े
स्वास्थ्य विभाग से मिले आकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-19 में अप्रैल से मार्च तक 14467 महिलाओं ने ही डायबिटीज की जांच करायी, जिसमें 779 में जेस्टेशनल डायबिटीज मिली। वही अप्रैल 2019 से दिसंबर 2019 तक 6274 महिलाएं जांच के लिए आई जिसमें 425 महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज मिली।

पीएमएसएमए दिवस पर करा सकते है जांच
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ॰ जी के निगम ने बताया कि नियमित ओपीडी के अलावा भी हर माह की 9 तारीख को पीएमएसएमए दिवस मनाया जाता है, इस दिन गर्भवती अपनी सम्पूर्ण जांच स्वास्थ्य केंद्र पर करा सकती है। यदि 9 तारीख को अवकाश होता है तो यह दिवस अगले दिन मनाया जाता है।