अफसरों की लापरवाही में फंसी #स्मार्ट_सिटी, #झांसी में बने #पिंक_टॉयलेट में लगा ताला

झांसी

अब तक की सबसे भयावह तस्वीरें, लाकडाउन के तीसरे चरण में भी पलायन का सिलसिला जारी

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झांसी से देवेन्द्र चतुर्वेदी के साथ हमीरपुर से रविन्द्र सिंह रिंकू की रिपोर्ट। हम बात करतें हैं उन प्रवासी श्रमिकों की, जो अपने गांव को छोड़कर दिल में कई सपने संजोए शहर पहुंचे। लेकिन आज कोरोना वायरस के खिलाफ लगे लाॅकडाउन ने उन्हें किस मोड़ पर लाकर खड़ कर दिया। यह उनसे बेहतर कोई नहीं समझता है। उनके हालत देखते हुए एक गजल याद आ रही है जिसके बोले हैं कि वक्त का ये परिंदा रुका है कहां, मंै था पागल जो इसको भुलाता रहा और चार पैसे कमाने मैं आया शहर, गांव मुझे याद आता। ठीक ऐसे ही हालत लाॅकडाउन के कारण महानगरों से लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के सामने बने हैं।


बुन्देलखंड समेत यूपी की अधिकतर सड़कों पर ऐसे मजदूरों के जत्थे देखने को मिल जाएंगे। जो पैसे नहीं हैं, खाना नहीं है बल्कि पेट पालने के लिए शहर आए थे। आज उन्हें कोरोना के कारण वापस गांव लौटना पड़ रहा है। इन हालात से कोई अनजान नहीं है। संक्रमण का खतरा बरकरार है, लेकिन इंसानियत के नाते पुलिस और प्रशासन इन जरूरतमंदों की मदद के लिए हर जरूरी कोशिश कर रहे हैं। रास्ते में ऐसे मजदूरों को खाना खिलाया जा रहा है। संक्रमण से बचने के लिए मास्क दिए जा रहे हैं और साथ ही समझाया भी जा रहा है कि आपका ये सफर आपके अपनों को ही मुश्किल में डाल देगा। लेकिन, सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर निकले ये मजदूर कहते हैं कि हम कोरोना से शायद बच भी जाएं, लेकिन भुखमरी से जरूर मर जाएंगे। इन लोगों के पैरों में छाले पड़ गए हैं, पर ये रुक नहीं रहे… चलते जा रहे हैं अपने गांवों की ओर।
मालूम हो कि देश में कोविड 19 कोरोना के बढते कहर से बचने के लिए देश में लाॅकडाउन का तीसरा चरण चल रहा है। आज भी श्रमिक भूखे-प्यासे पैदल अपने-अपने गांव की चले आ रहे हैं।


कानपुर से चलकर हमीरपुर पहुंचे रामकुमार का कहना है कि उन्हें छत्तीसगढ़ जाना है। कानपुर में वह निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी करते थे। लाॅकडाउन के कारण उनकी मजदूरी छिन गई। काफी इंतजार किया लेकिन उन्हें जब रोजगार मिलता नजर नहीं आया तो वह अपने गांव की ओर वापस लौट पड़े हैं।


इसी प्रकार श्रमिक लालू का कहना है काम-धन्धा छिन गया है। गांव जाने के लिए वाहन भी नहीं मिल रहा था। जिस कारण वह अपने साथियों के साथ पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिए है। रास्ते में यदि कोई वाहन मिल जाता है तो उन्हें बैठा लेता है नहीं तो वह पैदल ही चले जा रहे हैं। आखिर वह अपने गांव पहुंच ही जायेंगे।
यह कहानी केवल इन दो श्रमिकों की नहीं है बल्कि सड़कों पर पैदल चले आ रहे सैकड़ों श्रमिकों की है। जबकि सरकार कहती है कि ऐसे श्रमिकों की वह मदद कर रही है। आखिर उन तक क्यों नहीं पहुंच रही, क्यों उन्हें पैदल चलना पड़ रहा है। ऐस ही कई सवाल हैं जिनका जबाब सरकार या फिर पैदल चलने वाले श्रमिकों के पास है।

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