मंदिर मुददे से भाजपा की शिखर यात्रा का श्रेय पहुंचता है आडवाणी के खाते में

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(प्रधान सम्पादक केपी सिंह की कलम से) । राजनीति के कारण रिश्ते किस कदर बदल जाते हैं इसकी बानगी है भाजपा के पीएम इन वेटिंग तक पहुंचकर सफलता की मंजिल के एक कदम पहले ही तम्बू उखड़वा बैठे लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी के अभी तक के सबसे बड़े धूमकेतु स्टार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्तों का उतार-चढ़ाव। कभी आडवाणी नरेंद्र मोदी के लिए गाडफादर होते थे। लेकिन आखिरी में गुरूजी को अपने शिष्य की राह में रोड़े अटकाने के लिए प्रतिद्वंदी बनकर आगे आना पड़ा तो स्थितियां ही बदल गईं। इसका कसैलापन मोदी के जहन से अभी तक साफ नही हो पा रहा है।
रामरथ के सारथी रहे मोदी में मंदिर को लेकर क्यों उपजा विराग
1990 में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के आंदोलन के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का सारथी बनकर मोदी ने अपने को बहुत गौरवान्वित महसूस किया था पर प्रधानमंत्री बनने के बाद इस मुददे पर उनका अलग रुख पहेली बन गया। आज तक वे अयोध्या नही गये यह दूसरी बात है कि अब मंदिर निर्माण की आधारशिला वे ही अयोध्या जाकर रखेगें ऐसा खबरची बता रहे हैं। बहरहाल राम मंदिर मामले में उनके ‘‘विराग’’ की कड़ी कहीं न कहीं उनके और आडवाणी के बीच रिश्ते के बदले समीकरण से जुड़ी है।
मंदिर मुददे से भाजपा की शिखर यात्रा का श्रेय पहुंचता है आडवाणी के खाते में
मंदिर निर्माण का हर प्रसंग भाजपा की शिखर यात्रा में आडवाणी युग के चमकदार पड़ावों की याद दिलाता है। दूसरी ओर मोदी हैं कि आडवाणी के लिए उनके जन्मदिन जैसे अवसरों पर श्रद्धा प्रदर्शन का अभिनय करने के बावजूद उनकी बदले की आग शांत नही हो पा रही है। इसके चलते भाजपा के उत्थान में आडवाणी के योगदान के हर अध्याय को वे इतिहास के पन्नों से फाड़कर फेंक देने को उदद्त रहते हैं। यही वजह है कि राम मंदिर आंदोलन की तार्किक परिणति का प्रस्तुतिकरण बदलने की उन्होंने अपने मन के अंदर ठान रखी है। वे यह एहसास कराना चाहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन से भाजपा एक सीमा तक ऊपर चढ़ने के बाद नीचे गिरने को अभिशप्त हो गई थी। भाजपा की स्थाई और चरम सफलता इस मुददे से पिण्ड छुड़ाकर उनके गुजरात माडल की दम पर संभव हुई जो दरअसल सुशासन का माडल है। आश्चर्यजनक रूप से संघ ने भी मोदी की लाइन के अनुरूप अपने को बदला है और संघ प्रमुख मोहन भागवत के राम मंदिर पर उच्चतम न्यायालय का फैसला आने के बाद पहले वक्तव्य की इबारत को जिन लोगों ने भी ढंग से पढ़ा उन्होंने इसको भांपा है।
विभाजनकारी मुददों को कैसे बदला राष्ट्रीय अस्मिता के तत्वों में
राष्ट्रीय अस्मिता को मजबूत करना उन्होंने सुशासन के साथ उसके आवश्यक तत्व के रूप में व्यवहारिक तौर पर स्थापित किया है। इस दिशा में उनकी सधी हुई तैयारी का फल है कि तीन तलाक जो कि समान नागरिक संहिता लागू करने की पूर्व पीठिका जैसा है और अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने आदि मुददों को आडवाणी युगीन भाजपा के विभाजनकारी एजेंडे की छवि से मुक्त करके सुशासन की परिणति से जोड़ा जा सका है। राष्ट्रीय संप्रभुता को चुनौती देने के ढर्रे के बने रहते सुशासन का हर दावा छदम साबित होता, यह बात अब हर किसी को समझ में आ रही है। अनुच्छेद 370 को पंगु बनाने की कार्रवाई इसी संवेदना के साथ देश के जनमानस में ग्रहण की गई है जिसकी वजह से प्रगतिशील आतुरता में इसकी आलोचना का मंसूबा सजो रही राजनीतिक शक्तियों को चुप्पी साध जानी पड़ी। होना तो यह चाहिए था कि दक्षिणपंथी पार्टी की बजाय ये सभी कार्य वामपंथी दलों द्वारा पूरे किये जाने का प्रयास किया जाता। बशर्ते उन्होने अब दुनियां में एक मात्र कम्युनिष्ट टापू चीन से प्रेरणा ग्रहण की होती।
मोदी के चलते कहीं पीछे छूट गया मंदिर का मंडल-कमंडल संदर्भ
राम मंदिर आंदोलन को जब भाजपा ने अपना कंधा दिया तो उसमें मंडल-कमंडल के द्वंद का संदर्भ निहित था। तब आंदोलन में शंबूक कथा की प्रतीकात्मकता से प्रेरणा ग्रहण ही जा रही थी। इस स्थिति विकास के चलते पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का ताज सौंपने के बाद आगामी कार्रवाई में कल्याण सिंह जैसे प्रतिबद्ध नेता को षणयंत्र करके गर्दिश में धकेल दिया गया था। इसी तरह राम मंदिर निर्माण के लिए असंदिग्ध समर्पण के बावजूद उमा भारती तक को विलाप और विद्रोह करना पड़ गया था। जिससे राम मंदिर की ललक की इस व्यजंना को और बल मिला। मोदी के लिए जरूरी था कि राम कथा के संदेश को शंबूक वध की छाया से मुक्त करके नये तरीके से गढ़े क्योंकि आज सामाजाकि वंचितों का विपुल समर्थन ही भाजपा का सबसे बड़ा शक्ति श्रोत है जिसे सहेजा जाना चाहिए।
इतिहास के पराजयबोध की कुंठा से उबरे हिंदुत्व में सात्विकता की आभा
मोदी ने राम मंदिर निर्माण के प्रयास को एक नया मोड़ दे दिया है। तार्किक परिणति पर पहुंचते-पहुंचते मोदी की सूझ-बूझ से राम मंदिर की हूंक एक ऐसी चेतना की उत्प्रेरक बन गई जहां इतिहास के पराजय बोध से कुंठित भावनाएं नहीं हैं बल्कि आत्मविश्वास जनित बड़प्पन से भरा हिंदुत्व आज सामने है। जिसमें धर्म परिवर्तन कर चुके अपने भाइयों के प्रति सहोदर भावना की गर्मी तप रही है। इसलिए फैसले के दिन हिंदू समाज का उन्माद तिरोहित था और हिंदू समाज इस बात की परवाह कर रहा था कि कहीं उसका उत्साह मुस्लिम भाइयों की आत्मा को न दुखा दे। सारे उग्र हिंदू संगठन भी उस दिन अपने आचरण में गजब की सात्विक आभा दिखाकर विव्हल कर रहे थे।
मंदिर बनेगा लेकिन आडवाणी होगें इतिहास के कटघरे में
अब मोदी को बहुत सहजता से स्थापित करना है कि राम मंदिर निर्माण की राजनीति करने वाले पार्टी के उनके पूर्ववर्ती कर्णधारों ने उन्हें बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण विरासत सौंपी थी। जो कानून व्यवस्था को तहस-नहस करने का बारूदी सामान बटोरे हुए थी। उन्होंने राम मंदिर मुददे की ध्वंसात्मकता को रचनात्मक ऊर्जा में बदला। इस तरह आडवाणी को बिना उनका नाम दिये हुए इतिहास के कटघरे में खड़ा कर राम मंदिर का शिलान्यास वे देश पूजा के सबसे सशक्त केंद्र के रूप में करने जा रहें हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने टवीट करके इसका आभास दिलाया था। बकौल टवीट के चाहे राम पूजा हो चाहे रहीम पूजा यह अवसर भारत पूजा को सशक्त करने का है। मंदिर ट्रस्ट में किसी मुस्लिम हस्ती को भी वे शामिल कराना चाहते हैं। जिससे उसकी सदभाव से परिपूर्ण लाक्षणिकता को और पुष्ट किया जा सके। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इसी लाइन के अनुरूप प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस आशंका का निराकरण किया कि इसके बाद संघ काशी और मथुरा के लिए पूर्व घोषित अपने आंदोलन को तेज करेगा। इसकी बजाय भागवत ने कहा कि संघ आंदोलन नही करता, मनुष्य निर्माण करता है और इसी में जुटेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि मुसलमानों के एक बड़े तबके में भाजपा के लिए इस राजनीति से स्वीकृति पैदा हो रही है। वे संघ की इस थ्यौरी से अंतर्मन में सहमति अनुभव करने लगे हैं कि धर्म बदलने से उनके पुरखे नही बदल सकते। वे राम को अल्लाह का रूप माने या न माने लेकिन यह मानना पड़ेगा कि उनके भी पुरखे राम थे बाबर नही।